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दुबई को भाया गुलाबी-सफेद ड्रैगन फ्रूट, पहली बार 100 किलो निर्यात

सांगली के दो किसानों के खेतों में लहलहाई फसलज्यादा पानी की जरूरत नहीं, दूसरे किसान भी हो रहे आकर्षित  

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दुबई को भाया गुलाबी-सफेद ड्रैगन फ्रूट, पहली बार 100 किलो निर्यात

दुबई को भाया गुलाबी-सफेद ड्रैगन फ्रूट, पहली बार 100 किलो निर्यात

मुंबई. व्यावसायिक खेती में अव्वल महाराष्ट्र के किसानों को एक और बड़ी कामयाबी मिली है। सांगली में उगाया गया गुलाबी-सफेद ड्रैगन फ्रूट दुबई के ग्राहकों को रास आया है। जिले के दो किसानों ने 100 किलो ड्रैगन फ्रूट दुबई निर्यात किया है। अब तक अंगूर और गन्ने की खेती पर ध्यान देते रहे स्थानीय किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। अंगूर और गन्ने के मुकाबले ड्रैगन फ्रूट की खेती कम खर्चीली है। इसे ज्यादा खाद-पानी नहीं चाहिए। बहुत अधिक देखभाल की भी जरूरत नहीं। उबड़-खाबड़ जमीन पर भी इसकी खेती हो सकती है।
सांगली की कडेगांव तहसील के तडसर गांव के आनंद राव पवार ने छह साल पहले इसकी शुरुआत की। उन्होंने गन्ने की जगह ड्रैगन फ्रूट के पौधे लगाए। खेती के लिए जैविक तरीका अपनाया। जैविक खाद भी इस्तेमाल की गई। उनके खेत में कम से कम 300 ग्राम के ड्रैगन फ्रूट तैयार हुए। फलों का स्वाद तय मानकों पर खरा पाया गया। पवार की देखादेखी वांगी के राजाराम देशमुख ने भी डेढ़ एकड़ में ड्रैगन फ्रूट के पौधे लगाए। अच्छी कमाई की संभावना को देखते हुए देशमुख इसकी खेती का विस्तार पांच एकड़ में करना चाहते हैं।

पोषक तत्वों से भरपूर
ड्रैगन फ्रूट को वैज्ञानिक भाषा में हायलोसुडेट्स कहा जाता है। चीन में इसकी उपज ज्यादा होती है। कई पोषक तत्वों से फरपूर यह फल पहले भारत में आयात किया जाता था। दो दशक पहले इसकी खेती देश में शुरू हुई। कर्नाटक-आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में सीमित खेती शुरू हुई। देश-विदेश में अच्छी मांग को देखते हुए बड़े पैमाने पर इसकी खेती होने लगी है।

तीन तरह के फल
सांगली के कृषि अधिकारी बसवराज मस्तोली ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट तीन तरह का होता है-ऊपर गुलाबी-अंदर सफेद, ऊपर गुलाबी-अंदर लाल व ऊपर पीला-भीतर सफेद। यह फल सेहत के अनुकूल है। इसमें विटामिन, फाइबर, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा होती है।

बढ़ रही मांग
अधिकारियों के मुताबिक ड्रैगन फ्रूट की देश-विदेश में अच्छी मांग है। घरेलू बाजार में एक ड्रैगन फ्रूट 100 से 150 रुपए में बिकता है। तय मानक पूरे करने पर विदेश में भी आकर्षक कीमत मिलती है। मस्तोली ने बताया कि सांगली के अन्य गांवों के किसान भी अब इसकी खेती करना चाहते हैं। गन्ने की खेती के लिए यहां पानी कम पड़ रहा। अंगूर खेती खर्चीली है।