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आयुर्वेदिक गर्भनिरोधक दवा का फॉर्मूला तैयार

फैमिली प्लानिंग की दिशा में बड़ी कामयाबी10 साल के रिसर्च के बाद कॉलेज प्रोफेसर को मिला पेटेंट100 प्रतिशत आयुर्वेदिक, महिलाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं

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मुंबई. आयुर्वेदिक तरीके से परिवार नियोजन की दिशा में बड़ी कामयाबी मिली है। गर्भधारण से बचाव के लिए जल्द ही सौ फीसद हबर्ल दवा उपलब्ध हो सकती है। महाराष्ट्र के रायगड जिले के कर्जत स्थित दादा पाटील महाविद्यालय की सहायक प्रोफेसर डॉ. आशा भाउसाहेब कदम (सावंत) ने हबर्ल गर्भ निरोधक फॉमूर्ला (ओरल कांन्ट्रासेप्टिव) तैयार किया है। 10 साल लंबे रिसर्च के बाद उनके फॉर्मूले को भारत सरकार से पेटेंट मिला है। विश्वसनीय दवा निर्माता कंपनी के सहयोग में यह औषधि बाजार में उतारने की तैयारी है। ये दवा टैबलेट और लिक्विड दोनों रूप में उपलब्ध होगी। डॉ. कदम ने बताया कि उनका फॉर्मूला वैज्ञानिक कसौटी पर जांचा-परखा गया है। नियमानुसार पहले इसका परीक्षण चूहों पर किया गया। चूहों का प्रजनन रोकने में यह 100 प्रतिशत सफल रहा। इसके बाद महिलाओं को भी यह दवा दी गई। उन्होंने बताया कि ज्यादातर महिलाएं गर्भधारण से बचने में सफल रहीं। अहमदनगर कॉलेज के वनस्पति शास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. बीएम गायकर ने डॉ. कदम को सही दिशा में रिसर्च के लिए प्रेरित किया। उनके नाम से 21 रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं।

100 प्रतिशत हर्बल
डॉ. कदम ने बताया कि औषधि का फॉर्मूला 100 फीसद हर्बल है। औषधीय पौधों के सत्व से यह तैयार किया गया है। ज्यादातर आदिवासी महिलाएं इन पौधों के बारे में जानती हैं। वे इनका इस्तेमाल भी करती हैं। उनसे बातचीत कर हमने वैज्ञानिक तरीके से जांच की। विस्तृत अध्ययन के बाद फॉर्मूला तैयार किया। चूहों का प्रजनन रोकने में सफलता मिली। इससे हमारा उत्साह बढ़ा। इसके इस्तेमाल से महिलाएं भी समय से पहले गर्भधारण से बच सकती हैं।

साइडइफेक्ट नहीं
यह दवा वनौषधियों से तैयार होगी। महिलाओं पर इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होगा। गर्भ धारण से बचने के लिए रोजाना एक बार दवा खानी होगी। महीने में 21 दिन इसका सेवन करना होगा। चाहें तो हर दिन दवा ले सकते हैं। ज्यादातर महिलाएं शरीर में आयरन की कमी जैसी समस्या से जूझती हैं। हमारे गर्भनिरोधक फॉर्मूले में ऐसे कई तत्व हैं, जिससे न सिर्फ आयरन की मात्रा संतुलित होगी बल्कि महिलाएं तंदुरुस्त भी होंगी।

समझती हूं पीड़ा
गर्भधारण से बचाव के लिए बाजार में तमाम दवाएं उपलब्ध हैं। अधिकांश लोग इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। केमिकल आधारित इन दवाओं का साइडइफेक्ट होता है। कई तरह की दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। इन दवाओं के इस्तेमाल से कुछ महिलाएं तो संतान सुख तक से वंचित हो जाती हैं। थायराइड बढ़ जाता है तो हार्मोन में बदलाव की समस्या होती है। महिलाओं की यह पीड़ा मैं भलीभांति समझती हूं। इसीलिए मैंने वनौषधियों पर रिसर्च का फैसला किया।

आदिवासी महिलाएं सजग
डॉ. कदम ने बताया कि आदिवासी महिलाएं गर्भ निरोधक वनौषधियों के बारे में जानती हैं। इसके लिए मैं अहमदनगर के दूर-दराज के गांवों में गई। वहां की महिलाओं से बातचीत की। पौधों के पत्तों, छाल, बीज आदि को मिला कर हमने फॉर्मूला तैयार किया। इसके बाद मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के नेशनल टॉक्सीकोलॉजी सेंटर (पुणे) में जमा किया। जांच के बाद इसे मंजूरी मिल गई। 18 फरवरी को पेटेंट मिला है।