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Mumbai News: इकबाल के जज्बे को सलाम! जिनका कोई नहीं, उन्हें देते हैं आखिरी विदाई; कोरोना काल में किए 1400 शवों का अंतिम संस्कार

कोरोना काल के दौर में जब लोग अपनों को अंतिम विदाई भी नहीं दे पा रहे थे और कुछ लोग कोरोना फैलने के डर से अपनों की लाश तक क्लेम करने नहीं गए, उस समय उन शवों का पूरे तौर-तरीकों के साथ दाह संस्कार या दफनाने का काम किया मुंबई के इकबाल ने किया। इकबाल ममदानी से ने कोरोना काल के दौरान करीब 1400 शवों का अंतिम संस्कार किया।

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Iqbal Mamdani

अपनों का अंतिम संस्कार अपने ही करते हैं, लेकिन इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करते हैं। उनमें से एक मुंबई के इकबाल ममदानी हैं। इकबाल ममदानी कभी पेशे से पत्रकार हुआ करते थे। उनके परिवार का एक ममदानी हेल्थ एंड एजुकेशन ट्रस्ट के नाम से एक ट्रस्ट है। इस ट्रस्ट की स्थापना साल 2010 में हुई थी, लेकिन यह ट्रस्ट कोरोना काल में एक्टिव हुआ था।

कोरोना की पहली और दूसरी लहर में कई बार ऐसा भी समय आया था, जब किसी की मौत पर सरकार ने परिवार में किसी को भी अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी थी। मुंबई में हॉस्पिटल के स्टाफ एंबुलेंस से शव को किसी श्मशान या कब्रिस्तान ले जाते थे। वहां बीएमसी के कर्मचारी ही अंतिम संस्कार करते थे। लेकिन बीच-बीच में सरकार ने लगी बंदिशों पर कुछ राहत भी दी। अंतिम संस्कार में 20 और फिर 50 लोगों को जाने की अनुमति दी। उस समय भी कई लोग थे, जो कोरोना संक्रमण के फैलने के डर में शव को लेते ही नहीं थे। इकबाल ममदानी और उनके ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने उस दौर में करीब 1400 शवों का अंतिम संस्कार किया। इनमें 800 हिंदू और 600 मुस्लिम थे। यह भी पढ़े: Maharashtra News: शिंदे-फडणवीस करेंगे महाराष्ट्र का दौरा, बारिश से हुए नुकसान का लेंगे जायजा

बता दें कि इस बारे में इकबाल ममदानी कहते हैं कि जब हमने काम करना शुरू किया, तो पहले हम केवल मुस्लिम शवों को क्लेम करते थे और कब्रिस्तान तक पहुंचाते थे। लेकिन जब हम मॉर्चुरी में जाने लगे, तो हमने देखा कि कई शवों को लेने वाला कोई नहीं है। किसी भी धर्म और मजहब का हो, लेकिन हमने उस कोरोना काल में वह हालात देखे कि पिता बेटे का शव लेने को तैयार नहीं और बेटे मां-बाप की बॉडी क्लेम करने को तैयार नहीं थे।

उन्होंने आगे बताया कि तब हम लोगों ने डॉक्टरों से बात की और कहा कि अगर आप कहो तो हम ऐसे शवों का अंतिम संस्कार उनके रीति रिवाज से करवा सकते हैं। इसके बाद हॉस्पिटल ने पुलिस से इजाजत लेने को कहा। इकबाल ममदानी और उनकी टीम ने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि मृतक को उसके धर्म के हिसाब से विदाई दी जाए। मुस्लिम के लिए जनाजे की नमाज पढ़ी जाती थी, तो हिंदू को अग्नि देकर उनको मुक्ति पाने के लिए कामना की जाती थी।

भले ही कोरोना का डर अब लगभग खत्म हो गया है, लेकिन इकबाल ममदानी के लोग अभी भी मुंबई में हर महीने करीब 100 लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करते हैं। उनकी कुल दस लोगों की टीम है। इकबाल ममदानी ने बताया कि पुलिस और रेलवे पुलिस ने सभी थाना प्रभारियों को उनके नाम से नोटिफिकेशन जारी किया है कि यदि कोई लावारिस लाश आता है और यदि इकबाल ममदानी उसका अंतिम संस्कार करना चाहते हैं, तो पुलिस उनका पूरा सहयोग करे।

इकबाल ममदानी के मुताबिक, जब कोई मेल या लोकल ट्रेन के नीचे कोई आ जाता है, तो पुलिस वाले उसे हॉस्पिटल ले जाते हैं। उसके बाद पुलिस प्रयास करती है कि मृतक की पहचान हो जाए, जिससे उसके परिवार तक पहुंचा जा सकें। मृतक की जेब से कभी पर्स, कभी मोबाइल मिलता है, तो उसके माध्यम से परिवार को ट्रेस किए जाने का प्रयास किया जाता है, लेकिन जब परिवार महीने, डेढ़ महीने तक नहीं मिलता है, तब पुलिस उसे लावारिस घोषित करती है। उसके बाद शव को हॉस्पिटल की मॉर्चुरी से इकबाल ममदानी और उनके ग्रुप को दिया जाता है। ममदानी के मुताबिक, पुलिस का सिपाही बॉडी क्लेम के समय हमारे साथ खड़ा रहता है। बॉडी क्लेम करके अंतिम संस्कार तक भी साथ रहते हैं। अंतिम संस्कार के बाद उस सिपाही के माध्यम से हम पुलिस को सारे डाक्यूमेंट्स देते हैं।