हौसला : न गरीबी आड़े आई और न उम्र, 12 साल की बच्ची ने राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया महाराष्ट्र का नाम
अरुण लाल. मुंबई
कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात... मोती चाहे महल में रहे या झोपड़े में, उसकी चमक नहीं जाती...। आज हम आपको मिला रहे हैं एक छोटी-सी मोती रिंकी प्रदीप शाह (12) से, जिसकी कामयाबी पर बहुतों को भरोसा नहीं होता। सातवीं कक्षा में पढऩे वाली रिंकी की उपलब्धि काबिलेतारीफ है। देश की आर्थिक राजधानी के विलेपार्ले इलाके की एक चॉल में रहने वाली रिंकी जुलाई, 2018 से पहले आम लड़की ही थी। कुछ ऐसा हुआ कि आज वह जूडो के खेल में पहले स्टेट और फिर राष्ट्रीय स्तर पर खेल कर अपने परिवार, राज्य और कोच का नाम रौशन कर रही है। शर्मीली छोटी गुडिय़ा-सी मासूमियत लिए यह बच्ची जूडो की बात आते ही आत्मविश्वास से भर उठती है। रिंकी का सपना है कि वह देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले। अपने बारे में रिंकी बहुत कम बात करती है, पर खेल की बारीकियां उसे भली-भांति याद हैं। रिंकी के पिता प्रदीप ऑटो रिक्शा चलाते हैं, जिससे परिवार का गुजारा होता है। रिंकी अपने चार भाई बहनों में तीसरे नंबर पर है। यह परिवार एक छोटी-सी खोली (कमरा) में रहता है।
कोच ने रिंकी की प्रतिभा को तराशा
गरीब परिवार की बेटी रिंकी ने जुलाई, 2018 में स्कूल की तरफ से खेले जाने वाले जूडो में हिस्सा लिया। हर किसी ने यही समझा यह सामान्य बात है। पर, रिंकी की लगन और मेहनत देखते ही उनके कोच सुरेश शामिल समझ गए कि यह मोती है। उन्होंने रिंकी पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। नतीजा आश्चर्य चकित करने वाला मिला। कोल्हापुर में पिछले साल आयोजित प्रदेश स्तरीय जूडो में रिंकी गोल्ड मेडल जीतने में सफल रही।
बदल गई दुनिया
अब रिंकी की दुनिया बदल गई थी...। छोटी-सी उम्र में रिंकी जानती है कि उसकी कामयाबी में कई लोगों का हाथ है। सफलता का श्रेय वह अपने कोच और नंदी फाउंडेशन में काम करने वाली दीदी को देती है। गोल्ड जीतने के बाद हर कोई रिंकी की तरफ नजर बनाए हुए था। राष्ट्रीय स्तर की जूडो प्रतिस्पर्धा रांची में हुई। रिंकी का वजन 100 ग्राम ज्यादा था। उसने तीन दिन में अपना वजन कम कर लिया और ब्रांज मेडल हासिल कर अपने कोच को गौरवान्वित किया।
पिता को बेटी पर गर्व
रिंकी के पिता प्रदीप बताते हैं, मैं रिक्शा चलाता हूं, चार बच्चों और हम दो लोगों का जीवन किसी तरह से चल जाता है। मेरे लिए गर्व की बात है कि मेरी बेटी कुछ बेहतर कर रही है। पर, इसमें बहुत से लोगों का योगदान है। रिंकी जब नेशनल खेलने रांची जा रही थी, तब उसकी जरूरत के सामान का इंतजाम एक बड़ी समस्या थी। नंदी फाउंडेशन ने हमारी मदद की। संस्था ने रिंकी के खेल से संबंधित सारी जरूरतें पूरी कीं।
अच्छा काम कर रहे कई लोग
शाह ने कहा, लोग कहते हैं कि दुनिया में बुराई बढ़ रही है। पर, ऐसा नहीं है। दुनिया में अच्छे लोग भी हैं, और कई संस्थाएं अच्छा काम कर रही हैं। नंदी फाउंडेशन भी इनमें से एक है, जो गरीब परिवारों की बेटियों की प्रतिभा निखारने में योगदान कर रहा है।
बड़ी होकर कोच बनूंगी
रिंकी अपने कोच सुरेश शामिल से बेहद प्रभावित है। सेना से रिटायर सुरेश और उनकी पत्नी गरीब बच्चों को जूडो-कराटे सिखाते हैं। वे रिंकी के लिए रोल मॉडल हैं। रिंकी कहती है, अभी तो इंटरनेशनल लेवल पर खेल कर देश का नाम रौशन करूंगी...बड़ी होकर कोच बनूंगी।