
नागौर के जेएलएन अस्पताल में उगी अश्वगंधा की पौध
रुद्रेश शर्मा @ नागौर . श्रीगंगानगर और बीकानेर में जहां साजी किसानों की जिंदगी का जायका बदल रही है। वहीं पुष्कर के गुलाब उत्पादकों के जीवन को महका रहे हैं। लेकिन अफसोस कि जग प्रसिद्ध होकर भी ‘नागौरी अश्वगंधा’ यहां के किसानों को ‘तंदुरुस्त’ नहीं कर पा रही। बाजार में मांग होने के बावजूद सुनियोजित खेती के अभाव में नागौरी अश्वगंधा केवल जंगली वनस्पति बनकर रह गई है।
जानकारों के अनुसार आयुर्वेदिक दवाओं के लिए नागौरी अश्वगंधा (असगंध) की देश में सर्वधिक मांग है। इसकी तस्दीक योग गुरु बाबा रामदेव तक कर चुके हैं। यही नहीं बाजार में नागौरी अश्वगंधा के नाम से कई उत्पाद बेचे जा रहे हैं। लेकिन नागौर जिले में अश्वगंधा की खेती का कितना रकबा है, कितना उत्पादन हो रहा है और कितने किसान इसकी खेती कर रहे हैं, इसका हिसाब न कृषि विभाग के पास है और ना ही आयुर्वेद विभाग के पास। सिर्फ खानाबदोश लोग ही जंगली वनस्पति के रूप में पैदा हो रही अश्वगंधा को बाजार तक पहुंचा रहे हैं।
जंगल से तोडक़र दिखाते हैं बाजार
देशभर में मांग होने के बावजूद अश्वगंधा की आपूर्ति केवल खानाबदोश लोगों के सहारे बाजार तक हो रही है। जंगली वनस्पति की रूप में यहां वहां उगी अश्वगंधा को ये लोग तोडक़र बाजार तक पहुंचाते हैं। जबकि यदि सरकार इसकी सुनियोजित खेती को प्रोत्साहित करे तो यह अश्वगंधा नागौर के किसानों की तकदीर बदल सकती है।
इसलिए नागौरी अश्वगंधा की पहचान
अश्वगंधा (असगंध) एक जड़ी बूटी है, जिसे आयुर्वेदिक दवा के रूप में काम लिया जाता है। कहते हैं कि पहले यह राजस्थान के नागौर जिले में अधिक मात्रा में पैदा होती थी। इसलिए इसे नागौरी असगंध के नाम से जाना जाता है। अब व्यावसायिक रूप से इसकी खेती मध्यप्रदेश के मनासा, भानपुरा, जादव तथा नीमच में अधिक हो रही है। इसके अलावा पंजाब, हिमाचल, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों में भी पाई जाती है। राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक मांग वाले पौधों में से एक बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसे अत्यधिक औषधीय गुण वाला पौधा माना है।
इंग्लेंड में हो रही रिसर्च
कोरोनाकाल में आयुर्वेद के महत्व को पूरे विश्व ने जाना और समझा है। विदेशों तक में आयुर्वेद उत्पादों पर शोध हो रहे हैं और औषधियों की मांग भी इस बीच बढ़ी है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय की ओर से पिछले साल इंग्लेंड के तीन शहरों (लंदन, बर्मिंघम और लाइसेस्टर) में कोरोनाकाल के दौरान अश्वगंधा पर अध्ययन शुरू किया गया है।
ये हैं औषधीय फायदे
आयुर्वेद के जानकारों के अनुसार अश्वगंधा की जड़ में कई प्रकार के एल्केलाइड तथा एमिनो एसिड पाए गए हैं। जिनके कारण यह शरीर के लिए औषधि का काम करती है। इसके सेवन से थकान दूर होकर नई ताकत आ जाती है। असगंध की जड़ का चूर्ण दवा के रूप में लिया जाता है। शोधकर्ताओं ने अपने परीक्षणों में पाया कि असगंध हिमोग्लोबिन बढ़ाने तथा कोलेस्ट्रोल कम करने में सहायक है। इसके अलावा कैंसर, डिप्रेशन, एसिडिटी, अल्सर, हाई ब्लड प्रेशर आदि में लाभदायक है।
नागौरी अश्वगंधा की देशभर में पहचान
नागौर जिले की भौगोलिक परिस्थितियां अश्वगंधा के लिए अनुकूल है। यहां अच्छी किस्म की अश्वगंधा का उत्पादन होता है। इसीलिए इसकी देशभर में पहचान है। राजस्थान स्टेट मेडिसिनल प्लांट््स बोर्ड की ओर से औषधीय उत्पादन पर अनुदान भी दिया जाता है। किसान चाहे तो इसका लाभ ले सकते हैं।
डॉ. हरेंंद्र भाकर, आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी, नागौर
किसान रुचि दिखाएं तो हम सहयोग को तैयार
यह सही है कि नागौरी अश्वगंधा देशभर में अपनी अलग पहचान रखती है। यह एक औषधीय पौधा है। किसानों को खेती की तकनीकी जानकारी नहीं होने के कारण इसका अभी सुनियोजित तरीके से उत्पादन नहीं हो रहा है। लेकिन यदि किसान इसमें रुचि दिखाएंगे तो हम उन्हें प्रशिक्षण देने से लेकर अन्य जानकारी देने के लिए भी तैयार हैं।
हरिश मेहरा, उप निदेशक, कृषि विभाग, नागौर
Published on:
30 Mar 2022 11:04 pm
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