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प्रथम विश्व युद्ध से करगिल तक : शौर्य, बलिदान और परंपरा की धरती नागौर

भारतीय सेना दिवस : भारतीय सेना में नागौर के हर गांव के जवान, देश के लिए शहीद होने वालों की भी कमी नहीं, गांव-गांव लगी है शहीदों की प्रतिमाएं, कुछ गांव ऐसे, जहां हर परिवार में सैनिक

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sena bharti

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नागौर. राजस्थान के हृदय स्थल में बसा नागौर जिला सिर्फ कृषि एवं खनिजों के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय सेना में भर्ती होकर देश के बलिदान देने में भी अग्रणी रहा है। यहां का लगभग हर गांव देशसेवा की मिसाल पेश करता है। शायद ही ऐसा कोई गांव होगा, जहां का कोई जवान सेना में नहीं है। जिले के कुछ गांव तो ऐसे हैं, जहां लगभग हर घर में एक सैनिक है। जिले के कई गांवों में लगी शहीदों की प्रतिमाएं आने वाली पीढिय़ों को बलिदान की प्रेरणा देती हैं। भारतीय सेना दिवस के अवसर पर नागौर की यह सैन्य परंपरा देश के लिए गर्व का विषय है।

नागौर जिले से अब तक 180 से अधिक सैनिक देश के लिए अपना बलिदान दे चुके हैं। प्रथम विश्व युद्ध से लेकर करगिल युद्ध तक, नागौर के जवानों ने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया है। 1971 के युद्ध में शहीद हुए सुगन सिंह को सरकार की ओर से महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो पूरे नागौर जिले से यह सम्मान पाने वाले एकमात्र वीर योद्धा हैं।

हर बालक के दिल में देशसेवा का जज्बा

नागौर की मिट्टी में देशभक्ति रची-बसी है। अग्निवीर योजना से पहले जब जिला मुख्यालय पर सेना भर्ती रैलियां होती थी तो नागौर के युवा सेना में शामिल होने के लिए हजारों की संख्या में उमड़ पड़ते थे। जून 2019 में जिला मुख्यालय पर आयोजित सेना भर्ती रैली में 19,376 अभ्यर्थी दौड़ में शामिल हुए थे, जिनमें 1,728 युवा सफल हुए। यह आंकड़े बताते हैं कि यहां का युवा वर्ग सेना को सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान और कर्तव्य मानता है।

सैनिक नगर: जहां हर घर में फौजी

जिले के खींवसर उपखंड मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित सैनिक नगर गांव देशप्रेम और स्वाभिमान का जीवंत उदाहरण है। इस गांव के 150 से अधिक निवासी भारतीय सेना में कार्यरत हैं। प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर आज तक यहां के जवानों ने देश और दुनिया में पराक्रम दिखाया। ब्रिटिश काल में भी इस गांव के सैनिकों को विक्टोरिया क्रॉस जैसे सर्वोच्च सम्मान मिले। यहां के बच्चों में बचपन से ही सेना में भर्ती होने का सपना पलता है। प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1919) में इस गांव के रणजीत सिंह, पन्नेसिंह और जोगसिंह जैसे वीरों ने बलिदान दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) में रूपसिंह, कानसिंह सोनगरा और सबलसिंह चौहान शहीद हुए।

छोटी बेरी: हर घर से सैनिक

नागौर से अलग हुए डीडवाना-कुचामन जिले का छोटी बेरी गांव भी सैन्य परंपरा का प्रतीक है। यहां से वर्तमान में 200 से अधिक कार्यरत और करीब 500 सेवानिवृत्त सैनिक हैं। लगभग हर घर का सेना से सीधा रिश्ता है। यह गांव देशभक्ति की मजबूत भावना और सैन्य सेवा के प्रति समर्पण के लिए जाना जाता है, जहां युवा पीढ़ी सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित होती है।

कठौती: अनुशासन और साहस का गांव

जायल तहसील का कठौती गांव शूरवीरों की धरती है। यहां लगभग हर तीसरे घर का सेना से नाता रहा है। शहीद मूलाराम हों या आतंकियों से मुठभेड़ में घायल श्रवणराम- यह गांव साहस की कहानियों से भरा है।यहां भी करीब 100 से अधिक जवान वर्तमान में सीमा पर तैनात हैं, 150 से अधिक सेवानिवृत्त हो चुके हैं और 60-70 युवा सेना में जाने की तैयारी कर रहे हैं। पांच हजार की आबादी वाले इस गांव में सेना का अनुशासन घर-घर में दिखाई देता है।

नागौर: जहां सेना एक पेशा नहीं, परंपरा है

भारतीय सेना दिवस पर नागौर जिले की यह तस्वीर बताती है कि यहां देशसेवा केवल सपना नहीं, बल्कि पीढिय़ों से चली आ रही परंपरा है। शहीदों की प्रतिमाएं, सैनिकों की कहानियां और बच्चों की आंखों में सेना का सपना नागौर को सच्चे अर्थों में वीरभूमि बनाता है।