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video—500 साल पुरानी परम्परा आज भी निभा रहे माईच

होली पर शरीर पर सफेद मिट्टी का लेप , हाथ में दंड और गले में रोहिड़े की माला, भिक्षा मांगने देशभर से शामिल होते है इस गौत्र के लोग

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500 साल पुरानी परम्परा आज भी निभा रहे माईच

मेड़ता सिटी. इंदावड़ में फक्कड़ के रूप में नाचते-झूमते भिक्षा मांगते माईच समाज के लोग।

राधेश्याम शर्मा
मेड़ता सिटी. (नागौर). जिनकी अनदेखी करने पर ट्रेन तक रुक गई। 42 इंजन के इस्तेमाल के बाद जब ट्रेन नहीं चली और फिर उनकी शरण में जाकर माफी मांगने पर एक नारियल मात्र से फिर ट्रेन रवाना हो गई। ऐसे चमत्कारी जाेगी बाबा की ओर से करीब 500 साल पहले यह आशीर्वाद दिया गया था कि होली के अगले दिन धुलंडी पर दो साल में एक बार सफेद मिट्टी का लेप लगाकर भिक्षा मांगोगे तो कामना पूरी होगी। उन्हीं की इस परंपरा को निर्वहन कर रहे हैं उनके अनुयायी माईच गौत्र के लोग। मेड़ता से 16 किमी दूर इंदावड़ में आज भी होली के अगले दिन आपको ऐसी अद्भुत होली देखने को मिलेगी।
इंदावड़ में रहने वाले माईच गौत्र के लोगों के साथ प्रदेश एवं देश के अन्य राज्यों के माईच गौत्र के लोग यहां पहुंचते हैं। धुलंडी के दिन शरीर पर पांडू, चाइना क्ले व सफेद मिट्टी का लेप लगाते हैं और निकल पड़ते हैं गली-मोहल्लों में भिक्षा मांगने। दरअसल, जोगी बाबा के आशीर्वाद अनुसार यह आयोजन दो साल में एक बार होता हैं। जिसके तहत 2021 में इसका आयोजन होने के बाद इस होली पर यह परंपरा निभाई गई। इसको लेकर इंदावड़ के साथ क्षेत्र के बीटन, बड़गांव, मांडल जोधा, पादूखुर्द, पादूकलां और राज्य के सीकर, झूंझुनु सहित देश के अन्य राज्यों से माईच गौत्र के लोग इंदावड़ पहुंचे। शरीर पर सफेद मिट्टी का लेप लगा, ऊंट की मिंगणी व रोहिड़े के फूल की माला पहन फक्कड़ का वेश धारण करने के बाद ढोल-नगाड़ों की धुन व जोगी बाबा के भजनों के साथ इंदावड़ स्थित डूडियों के मोहल्ले से सैंकड़ों की संख्या में यह लोग रवाना हुए। गांव के मुख्य मार्गों से होते हुए निकले और भिक्षा ली। भिक्षा में लोगों की ओर से इन्हें अनाज, घी, गुड़ एवं नकदी दी जाती है।
धुलंडी के दिन जन्मे बच्चे को भी लगाई जाती है लेप

इंदावड़ गांव में फक्कड़ बनने वाले माईच गौत्र के पांचाराम, गुदाराम, सहदेवराम ने बताया कि हमारे यहां हर दो साल में एक बार इस तरह का आयोजन होली के बाद धुलंडी के बाद होता है। फक्कड़ का वेश धारण कर घर-घर जाकर भिक्षा मांगते हैं। साथ ही धुलंडी के दिन माईच के यहां जन्मे बच्चे को भी सफेद मिट्टी का लेप लगाया जाता है।

यह है जोगी बाबा के चमत्कार की किवंदती... इसलिए नाम पड़ा जोगी मगरा स्टेशन
इंदावड़ के बुजुर्गो के अनुसार रियाश्यामदास के पास स्थित वर्तमान के जोगीमगरा में आज से 500 साल पहले ठाकुर समाज के जोगीदास रहते थे। बाद में वो भक्ति में लीन होकर जोगीबाबा बन गए। दरअसल, वहां अंग्रेजी काल के बाद जयपुर से जाेधपुर की तरफ ट्रेन चली थी। उन दिनों में जोगीबाबा ने ट्रेन को रोकने का इशारा किया पर ट्रेन रुकी नहीं। इसके बाद कुछ दूर जाकर वो ट्रेन जाम हो गई। ट्रेन को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ कई इंजन लाकर ट्रेनों को चलाने का प्रयास किया गया लेकिन ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। तब वहां अंग्रेजों ने भी यह माना कि यहां कोई स्पेशल पावर काम कम रही है। बाद में जहां जोगीबा अपना धूणा लगाकर तपस्या में लीन थे, वहां सब पहुंचे। उन सब ने जोगीबाबा के शरण में जाकर माफी मांगी तो फिर सिर्फ एक नारियल के जरिए ट्रेन आग बढ़ चली। जोगी बाबा के इस चमत्कार के बाद उस समय उस स्टेशन का नाम जोगीमगरा रखा दिया गया।
गांव में 13 लाख से मंदिर बनाया, बगल में गांंठ होने पर लोग लगाते हैं परिक्रमा

इंदावड़ में 36 कौम के लोगों ने आपसी सहयोग से 13 लाख की लागत से जोगीबाबा का एक मंदिर बनवाया। ऐसी मान्यता है कि अगर किसी के बगल (अंडर आर्म्स) में गांठ-खाखोलाई हो जाती है तो यहां लोग विशेष रूप से परिक्रमा और प्रसादी चढ़ाने आते हैं। जिससे रोगी को बीमारी से निजात मिलता है। यह भी माना जाता है कि देशभर में जितने भी माईच गौत्र के लोग रहते हैं वो इंदावड़ से ही नाता रखते हैं तथा सभी इंदावड़ आकर जोगीबाबा के मंदिर में फेरी लगाता है।