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ऊंट को राज्य पशु का दर्जा बना पशुपालकों के लिए अभिशाप

राजवीर रोज खजवाना (nagaur). राजस्थान का जहाज कहलाने वाले ऊंटों की संख्या लगातार घट रही है। पशुगणनाएं बताती है कि ऊंटों की संख्या में अप्रत्याशित कमी दर्ज की गई है। चरवाह जातियों के लोगों की अर्थव्यवस्था का एकमात्र आधार पशु ही है, ऐसे में अगर इनका संरक्षण नहीं होगा तो ऊंटों की विलुप्ति के साथ चरवाह जाति के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है।

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nagaur

ऊंट पालन

- राजस्थान में चारे-पानी की कमी के कारण पशुपालकों का ऊंट पालन के प्रति मोह भंग

- रेगिस्तान के जहाज की घटती संख्या पर जेएनवीयू पहली बार करेगा शोध

- चरवाह जातियों के सामाजिक व आर्थिक विकास के प्रभावों की होगी समीक्षा

-भटनोखा के डाॅ ओमप्रकाश राजपुरोहित के प्रस्ताव को मिली शोध की स्वीकृति


राज्य सरकार द्वारा 2014 में ऊंट को संरक्षण देने के लिए राज्य पशु तो घोषित कर दिया, लेकिन इस के बाद चरवाह द्वारा ऊंट को प्रदेश के बाहर ले जाने की पाबंदी लगने से पशुपालकों व चरवाहों के लिए नई समस्या बन गई है। चारे-पानी की कमी के कारण पशुपालकों का ऊंट पालन के प्रति मोह भंग होने लगा है।

इसे देखते हुए भारतीय सामाजिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली द्वारा Òराजस्थान में घटती ऊंटों की संख्या के शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में चरवाह जातियों के सामाजिक व आर्थिक विकास पर प्रभावÓ विषय पर शोध परियोजना के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए गए थे। इसमें देशभर से बड़ी संख्या में शोध प्रस्ताव आए, स्क्रीनिंग एवं ऑनलाईन प्रस्तुतिकरण के बाद भटनोखा के डाॅ ओमप्रकाश राजपुरोहित के शोध प्रस्ताव को परिषद ने स्वीकृति दी है। शोध कार्य की अवधि एक वर्ष की है। डाॅ राजपुरोहित वर्तमान में जोधपुर के जयनारायण विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के सहायक प्रोफेसर व परियोजना निदेशक के पद पर सेवारत है, साथ ही इसरो द्वारा संचालित आउटरिच कार्यक्रम के विश्वविद्यालय के नोडल सेंटर के समन्वयक भी है।

जेएनवीयू जोधपुर के भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जयसिंह राठौड़ ने बताया कि राज्य के शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में पशुपालन एवं पशुचारण आजीविका के प्रमुख साधनों में से एक रहा है। विगत दशकों में राज्य पशु ऊंट की घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई है। इसके सामाजिक व आर्थिक पक्ष भी है और इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव उन सामाजिक समूहों पर पड़ा है जिनकी आजीविका का आधार पशुपालन व पशुचारण रहा है।

राज्य सरकार ने ऊंटों के संरक्षण के लिए 30 जून 2014 को ऊंट को राजस्थान का राज्य पशु घोषित किया था। सरकार के इस कदम से ऊंटों का संरक्षण होने के बजाय ऊंटों की कमी होना शुरू हो गया, क्यों कि राज्यपशु के दर्जे के बाद इनके प्रदेश से बाहर जाने से रोक लगा दी गई। इससे पहले चरवाहे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, गुजरात, हरियाणा तक ऊंट चारण के लिए जाते थे। अब बाहर जाने से रोक के कारण पशुपालकों की आजीविका पर भी विपरित असर पड़ रहा है।

बोलते आंकड़े

-भारत के कुल ऊंटों (2.5 लाख) में से 85.2 प्रतिशत राजस्थान में पाए जाते हैं।

- 2012 की तुलना में 2019 में ऊंटों की संख्या में 34.69 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

- वर्ष 1991 में ऊंटों की संख्या 8 से 10 लाख के बीच थी।

- 1951 में कुल पशुधन के 1.34 प्रतिशत ऊंट थे, जो 2019 में 0.37 प्रतिशत रह गए है।

शोध कर पता लगाएंगे संरक्षण के तरीके

राजस्थान में ऊंटों की लगातार घट रही संख्या व चरवाह जातियों के सामाजिक आर्थिक विकास पर प्रभाव विषय पर उनका शोध प्रस्ताव स्वीकृत हुआ है। ऊंट की घटती संख्या के कारणों का पता लगाकर उसके संरक्षण के लिए शोध किया जाएगा। रेबारी व देवासी जैसी चरवाह जातियों पर इसका सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है।

डाॅ. ओमप्रकाश राजपुरोहित

सहायक प्रोफेसर, जेएनवीयू ,जोधपुर

विभाग से हरसंभव सहायता, फिर भी दम तोड़ रहे पशु मेले

पशुपालकों व चरवाहों को पशुपालन विभाग से हरसंभव सहायता की जा रही है, फिर भी नागौर का बाबा रामदेव पशु मेला व मेड़ता के बलदेव पशु मेले में ऊंटों की संख्या तेजी से क्यों कम हो रही है इसका पता लगाने के लिए भी विभाग प्रयासरत है।

डाॅ. महेश मीणा

संयुक्त निदेशक,

पशुपालन विभाग, नागौर