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मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा वितरण योजना : करोड़ों का बजट, फिर भी मरीजों को नहीं मिल रही पूरी दवाइयां

मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा वितरण योजना में प्रदेश में व्यय हो रही है करोड़ों की राशि, इसके बावजूद मरीजों को कई दवाइयां खरीदनी पड़ती है बाहर से, संविदाकर्मियों को भी नहीं मिलता पूरा मानदेय

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JLN Hospital Nagaur

JLN Hospital Nagaur

नागौर. प्रदेश में मुख्यमंत्री नि:शुल्क निरोगी राजस्थान (दवा) योजना के तहत हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, इसके बावजूद जिला मुख्यालय के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को पूरी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। नागौर सहित कई जिलों के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को नि:शुल्क दवा केंद्रों पर पूरी दवाइयां उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। मजबूरी में मरीजों को बाजार से महंगी दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं, जिससे योजना के उद्देश्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 से 2025 के बीच दवा खरीद पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए गए। वर्ष 2023 में 1395 करोड़, 2024 में 1475 करोड़ और 2025 में 1410 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया, जिसे अधिकारियों ने पूरा का पूरा व्यय भी कर दिया, इसके बावजूद ज्यादातर मरीजों को अस्पताल के नि:शुल्क दवा वितरण केन्द्र से पूरी दवाइयां नहीं मिलती। यानी हर साल भारी बजट खर्च होने के बावजूद आम मरीजों को राहत नहीं मिल पा रही है।

जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो जयपुर-1 में तीन वर्षों में सबसे अधिक 997.75 करोड़ रुपए खर्च हुए, जबकि बीकानेर में 382.04 करोड़ और जोधपुर में 376.40 करोड़ रुपए व्यय किए गए। वहीं नागौर जिले में तीन साल में 129.69 करोड़ रुपए खर्च हुए, लेकिन यहां मरीजों को आज भी पूरी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। जबकि जिला स्तरीय अधिकारियों को खुद के स्तर पर भी दवाइयां खरीदने की अनुमति है और समय-समय पर खरीदी भी जाती है, लेकिन वो कौनसी दवाइयां खरीदी जाती है और कहां सप्लाई होती है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

जेएलएन अस्पताल व एमसीएच विंग - मरीजों की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं

- पत्रिका टीम ने शुक्रवार को पंडित जेएलएन राजकीय जिला अस्पताल में आए कुछ मरीजों से बात की तो नि:शुल्क दवा योजना की पोल खुली। झाड़ीसरा से आए सम्पतराम ने बताया कि वह अपने बेटे देवेन्द्र को बुखार आने पर एमसीएच विंग में डॉक्टर को दिखाने आया। यहां डॉक्टर ने तीन प्रकार की दवा लिखी, जिसमें से एक दवा मिली, जबकि शेष बाहर से खरीदने के लिए कहा गया।

- उर्मिला ने बताया कि डॉक्टर ने उसकी पर्ची पर पांच प्रकार की दवा लिखी, लेकिन डीडीसी से उसे मात्र एक शीशी दी गई, शेष दवा बाहर से खरीदने के लिए कहा गया।

- साईदा ने बताया कि उसे खांसी की दवा नहीं दी। बोले- बाहर से ले लो। इसी प्रकार भंवर कंवर की पर्ची पर डॉक्टर ने तीन दवाइयां लिखी, जिसमें से एक दी और दो पर क्रॉस लगाकर बाहर से खरीदने के लिए बोल दिया।

- डायबिटीज मरीज सुमन ने बताया कि पिछले तीन महीने से अस्पताल में इंसुलिन की दवा नहीं है, जिसके कारण डॉक्टर पर्ची पर लिख ही नहीं रहे हैं।

प्रदेश में दवा खरीदने के लिए 152 सप्लायर से अनुबंध

राज्य सरकार की ओर से विधानसभा में पेश रिपोर्ट के अनुसार योजना के तहत प्रदेश में दवा खरीद के लिए 152 सप्लायर से अनुबंध किए गए हैं। इसके बावजूद कई अस्पतालों में जरूरी दवाओं की कमी बनी हुई है। मरीजों का कहना है कि अस्पताल में डॉक्टर दवा लिखते हैं, लेकिन मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध नहीं होने के कारण बाहर से खरीदनी पड़ती है।

संविदाकर्मियों को न वेतन, ईपीएफ

योजना में संविदाकर्मियों की भी अहम भूमिका है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेशभर में मशीन विद मैन के 4710, फार्मासिस्ट के 251 और डीडीसी हेल्पर के 598 पदों पर कार्मिक कार्यरत हैं। हालांकि इन्हें भी पूरा मानदेय नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। जेएलएन अस्पताल में संविदाकर्मियों को न तो समय पर मानदेय मिलता है और न ही उनका ईपीएफ जमा कराया जा रहा है। विभागीय अधिकारी मानदेय का भुगतान श्रम विभाग की न्यूनतम मजदूरी दर और वित्त विभाग के परिपत्र के अनुसार करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात कुछ और ही हैं।

पता करके दूसरी जगह से मंगवाएंगे

इंसुलिन की जगह दूसरी दवा आने लगी है, जबकि खांसी की दवा को लेकर जबसे विवाद हुआ है, तब से दिक्कत चल रही है। जेएलएन अस्पताल में अभी सॉफ्टवेयर बदला है, इसलिए सारी दवाइयां ऑनलाइन नहीं हो पाई है, इसलिए परेशानी आ सकती है। मैं कल ही फीडबैक लेकर पता करता हूं, जो-जो दवाइयां नहीं है, वे दूसरे वेयरहाउस से मंगवाकर पूर्ति करवाएंगे।

- डॉ. राजेश पारासर, प्रभारी जिला औषधि भंडार, नागौर