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पारम्परिक धंधे को कोरोना के झटके, अब कहां से आएंगे मटके

गर्मी के शुरुआत के साथ ही तेज होने लगती थी चाक की गति, अब मंद पडऩे लगे चाक के चक्कर , भारी मात्रा में बनते और बिकते हैं मटके पर इस बार कुंभकारों का कारोबार संकट में

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पारम्परिक धंधे को कोरोना के झटके, अब कहां से आएंगे मटके

नागौर. चेनार गांव में मटके बनाता कुंभकार।

जीतेश रावल
नागौर. कोरोना संकट में कुंभकारों की चाक मंद पड़ती नजर आ रही है। गर्मी के दिनों में जिस तेजी से मटकों की बिक्री होती है वह इन दिनों दिखाई नहीं दे रही। अच्छी कमाई की चाह में कुंभकार गर्मी के मौसम का इंतजार करते हैं, लेकिन कोरोना ने इस धंधे को झटका दे दिया है। बिक्री नहीं होने से कई लोग इन दिनों मटके बना तो रहे हैं, लेकिन सीमित मात्रा में। शहर के आसपास चेनार गांव में कई लोग मटका निर्माण करते हैं। स्थानीय कुंभकार भारी मात्रा में मटके व सुराही बनाते हैं। सीजन में कमाई के लिए कई लोग अन्य शहरों से भी मटके खरीदकर लाते हैं, लेकिन इनकी व्यथा सुनी तो पता चला कि इस बार वे संकट में हैं। गर्मी की शुरुआत में ही मटकों की मांग बढ़ जाती थी वहीं इनको दम मारने की फुर्सत नहीं होती थी। लेकिन, इन दिनों इनके पास समय ही समय है। पारम्परिक धंधा होने से वे इसे छोड़ तो नहीं सकते, लेकिन कमाई कम होने से मोह भंग होता जा रहा है। चेनार गांव के मुल्तान प्रजापत व पापालाल प्रजापत ने बताया कि मेहनत के अनुरूप मोल नहीं मिलने से मुश्किल बढ़ रही है। इस बार कोरोना संकट के कारण स्थितियां और भी विकट हो गई है।

पड़ा रह गया बना हुआ माल
मिट्टी से सुराही व मटके बनाने वाले कारीगर बताते हैं कि वे लोग बाहर के अन्य शहरों में मटके बेच लिया करते थे। गांव में फेरी लगाकर व साप्ताहिक बाजारों में मटके-सुराही बिक जाते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। लॉक डाउन के कारण उनका धंधा पूरी तरह चौपट हो चुका है। ग्राहक बिल्कुल नहीं आ रहे, जिससे परिवार का पेट पालना ही मुश्किल हो रहा है। सीजन को देखते हुए बनाया माल भी ज्यों का त्यों रखा हुआ है।

पुराने मटकों से ही निकलेगी सीजन
गर्मी में कंठ तर करने के लिए लोग मटका व सुराही के पानी को श्रेयस्कर मानते हैं। अमीर से लेकर गरीब मजदूर तक मटका पंसद करते हैं। ऐसे में गर्मी के दिनों में इनकी मांग बढ़ जाती है। प्याऊ लगाने के लिए भी मटकों की अच्छी खरीद होती है, लेकिन इस बार न तो प्याऊ स्थापित होंगे और न ही बाजार में मटके आ रहे हैं। घरों में भी जहां हर वर्ष नया मटका लाने की परम्परा है, लेकिन इस बार शायद पुराने मटकों से ही यह सीजन निकालनी पड़ेगी।