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देशभर में कुचेरा के कृषि यंत्रों की डिमांड

- हल, तैई व पुलाव से लेकर ट्रॉली तक बनते हैं - कुचेरा में 4-5 बड़े व करीब डेढ़ दर्जन छोटे कारखानेंअसम, झारखण्ड, बिहार तक बनी पहचान

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देशभर में कुचेरा के कृषि यंत्रों की डिमांड

कुचेरा. कारखाने में बन रहे कृषि यंत्र।

कुचेरा. खेती- किसानी को आसान व सुविधायुक्त बनाकर अधिक उत्पादन लेने में कृषि यंत्रों का बड़ा महत्व है। यहीं कारण है कि नागौर जिला का कुचेरा शहर कृषि यंत्र उत्पादन का हब बनता जा रहा है। यहां के कारखानों में तैयार किए गए कृषि यंत्रों की देश के कई राज्यों में विशेष मांग रहती है। कुचेरा में बने हल, तैई, पुलाव, पीस, हैरा, करेई आदि प्रदेशभर में अलग पहचान रखते हैं। यहां बनने वाली ट्रेक्टर ट्रॉली राजस्थान के साथ असम, झारखण्ड, बिहार, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश में भी प्रसिद्ध है।

छह दशक पूर्व रखी नींवकुचेरा में करीब छह दशक पूर्व हरिराम जांगिड़ ने कृषि औजारों का निर्माण करना शुरू किया था। वर्तमान में यहां 4-5 बड़े व करीब डेढ़ दर्जन छोटे कारखानों में ट्रॉली, हल, तैई, पुलाव, डिश, पीस व कीटनाशक छिड़काव मशीन आदि बनाए जा रहे हैं।

तकनीकी के विकास के साथ ही कई गुना बढ़ा उत्पादन

कृषि यंत्र बनाने में पहले मानवीय श्रम अधिक होता था। जिसमें लोहे को भट्टी में तपाकर हाथ पांवों से दबाकर उसे मोड़कर आकार दिया जाता था। ट्रॉली में केवल चेशिस लोहे का व बाकी लकड़ी से बनाई जाती थी। उस समय उत्पादन भी सीमित रहता था। वर्तमान में तकनीकी व मशीनरी का उपयोग होने से उत्पादन कई गुणा तक बढ़ गया है। हालांकि तकनीकी के उपयोग के साथ ही खर्चो में भी कई गुणा बढ़ोतरी हुई है। लेकिन अधिक संख्या में उत्पादन व बिक्री होने से आय भी ठीक हो जाती है।

इनका कहना हैपहले हर काम हाथ से होता था। अब मशीनरी के उपयोग से उत्पादन बढ़ने के साथ खर्च भी कई गुणा बढ़ गया है। कृषि यंत्रों की स्थानीय बिक्री पर अधिक जोर रहता है। यहां से कोई ठेकेदार बाहर जाते हैं तो वे ट्रोलियां ले जाते हैं।

जयप्रकाश जांगिड़, कृषि यंत्र निर्माता, कुचेरा।

तकनीक के विकास के साथ ही कृषि यंत्र उद्योग में भी क्रांति आई है। पहले हाथ से औजार बनाते थे इस लिए सीमित संख्या में ही बनते थे। वर्तमान में मशीनरी व तकनीकी युग में उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन खर्च उससे कहीं ज्यादा बढ़ गया। जिससे उत्पादन के मुकाबले आय नहीं बढ़ी है।रामरतन जांगिड़

पहले शारीरिक श्रम अधिक हुआ करता था। गण हथोड़े चलाकर यंत्र बनाते थे। वर्तमान में सुविधाओं की अधिक आवश्यकता रहती है। गण हथोड़े उठाने वाले नहीं मिलते, इसलिए तकनीकी का उपयोग जरूरी हो गया है।

नेमीचंद, खेमीचंद जांगिड़