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असाध्य रोगों का इलाज करने वाले अस्पतालों को सरकार नहीं देती बजट

Nagaur patrika latest newsय. आयुर्वेदिक जिला हास्पिटल में न स्टाफ, न बजट, परिणाम शानदार. Nagaur patrika latest newsय.

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Government does not give budget to hospitals treating incurable diseases

Neither staff nor budget in Ayurvedic District Hospital

नागौर. दुनिया के तमाम देशों के लोग जहां असाध्य एवं लाइलाज बीमारियों के उपचार के लिए आयुर्वेद की शरण में पहुंचने लगे हैं, वहीं प्रदेश की सरकार का आयुर्वेदिक जिला अस्पतालों पर ध्यान नहीं दिए जाने के कारण हालात बेहद ज्यादा खराब होने लगे हैं।

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इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ए ग्रेड का अस्पताल होने के बाद न तो इसे बजट मिलता है, और न ही खाली पदों को भरने की जहमत उठाई गई। स्थिति यह हो गई है स्थानान्तरण या अवकाशप्राप्त होने के बाद पदों पर कोई तैनातगी नहीं की जा रही है। इसके चलते जिला अस्पताल महज दो चिकित्सक एवं एक नर्सिंगकर्मी के सहारे बमुश्किल चल रहा है। जबकि हाल ही में फैले डेंगू सरीखी बीमारियों के उन्मूलन में इन अस्पतालों की अहम भूमिका रही है

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शहर के हाउससिंग बोर्ड, ताऊसर रोड स्थित जिला आयुर्वेदिक अस्पताल में पिछले दस सालों से न तो खाली पदों को भरा गया, और न ही आवश्यकतानुसार बजट मिला। इसकी वजह से अस्पताल की हालत बिगड़ती चली गई। अस्पताल में सुविधाओं के विस्तार में वार्डों आदि के निर्माण होने की स्थिति में यहां पर रोगियों को लाभान्वित किया जा सकता, लेकिन इसके लिए विभाग की ओर से निदेशालय स्तर पर पत्राचार कई बार करने के बाद भी हालात नहीं सुधरे। जबकि ए ग्रेड का अस्पताल होने की स्थिति में यहां पर बाकायदा वार्डों में मरीजों के भर्ती होने की सुविधा आदि के साथ स्टॉफ आदि की नियुक्तियां होनी चाहिए थी। विभागीय जानकारों के अनुसार इसके लिए प्रयास भी किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिली।

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इनके सहारे चल रहा है काम
अस्पताल में पीएमओ एक, एसएमओ प्रथम, एसएमओ द्वितीय के एक-एक पद लंबे समय से खाली चल रहे हैं। यहां पर एक एमओ व एक चिकित्सक और एक नर्सिंगकर्मी की नियुक्तियां की गई है। पूरे जिला अस्पताल में केवल यही तीन चिकित्साकर्मी पिछले कई सालों से अस्पताल का संचालन कर रहे हैं। चतुर्थ श्रेणी कर्मी की आवश्यकता होने के बाद भी यहां पर इसकी नियुक्ती नहीं की गई। स्थिति यह है कि यदि एक चिकित्सक या चिकित्साधिकारी अवकाश पर हैं, और दूसरे को भी सरकारी कार्यों से जिले से बाहर जाने की स्थिति में अस्पताल कब खुलेगा, और बंद होगा, का अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है।

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बजट के नाम पर जरूरतमंद खर्च के लिए 25 हजार वार्षिक का बजट
जिला अस्पताल को आवश्यक खर्च आदि के के लिए पूरे साल में एक बार महज 25 हजार का बजट मिलता है। इस 25 हजार में ही बिजली,पानी या फिर स्टेशनरी आदि के खर्च करने हैं। इसमें आवश्यकतानुसार आंशिक रूप से मरम्मत आदि की आवश्यकता होने पर उसे भी कराने का प्रावधान है। राशि अपर्याप्त होने की वजह से ज्यादातर तो चिकित्सकों के जेब से ही राशि व्यय हो जाती है।

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राजकीय जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय सहित सामुदायिक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का बजट जहां करोड़ों में रहता है, वहीं आयुर्वेदिक चिकित्सालय को एक धेला तक नहीं मिलता। जबकि जेएलएन सहित अन्य स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थिति यह रहती है कि विगत माह बदले हुए स्वरूप में आए हुए डेंगू रोगियों को तत्काल प्रभाव से जोधपुर रेफर कर दिया गया। यही नहीं, अन्य कई बीमारियों में भी जिला अस्पताल होने के बाद भी करोड़ों का बजट मिलने के बाद भी केवल रेफरल अस्पताल बनकर रह गया है। ऐसे मौकों पर डेंगू या फिर स्वाइन फ्लू, इन घातक बीमारियों में भी आयुर्वेदिक केन्द्रों ने रोगियों का बाकायदा उपचार किया। इसके बाद इनकी उपलब्धी सरकार को नजर नहीं आने से विभाग के अधिकारियों को मलाल है। आयुर्वेदिक विभाग के अधिकारियों के अनुसार बजट व सुविधा मिले तो फिर नागौर में ही कई असाध्य बीमारियों का सफल उपचार किया जा सकता है।

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इनका कहना है...
ए श्रेणी का अस्पताल होने के साथ ही इसे पर्याप्त बजट मिलने पर अस्पताल शानदार परिणाम दे सकता है। स्टॉफ की तैनातगी भी पर्याप्त संख्या में होने पर निश्चित रूप से रोगियों को बेहतर सुविधा भी मिलेेगी।
डॉ. हरेन्द्र भाकल, आयुर्वेदिक चिकित्साअधिकारी, जिला आयुर्वेदिक अस्पताल नागौर