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नागौर

यहां वाहन का हॉर्न बजाने से पढ़ाई और इलाज में पड़ रहा खलल

रवीन्द्र मिश्रा
नागौर. शहर का विस्तारीकरण होने के साथ ही नागौर शैक्षणिक दृष्टि से भी प्रगति कर रहा है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सुदृढ़ हुआ है। कई शिक्षण संस्थान व अस्पताल राजमार्गों पर स्थित होने से यहां दिनभर भारी वाहनों का आवागमन रहता है। वाहन चालकों की ओर से पूरे दिन प्रेशर हार्न बजाने से विद्यार्थियों की पढ़ाई में और अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती मरीजों के स्वास्थ्य लाभ में काफी खलल पड़ा है।

नागौरJun 28, 2024 / 12:26 am

Ravindra Mishra

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नागौर का मिर्धा कॉलेज

– हाइवे पर जिला अस्पताल के सामने से दिनभर गुजर रहे सैकड़ों वाहन

– मिर्धा कॉलेज व महिला कॉलेज के सामने सहित कई कोचिंग संस्थानों के सामने से गुजरने वाले वाहन बजाते प्रेशर हॉर्न
रवीन्द्र मिश्रा

नागौर. शहर का विस्तारीकरण होने के साथ ही नागौर शैक्षणिक दृष्टि से भी प्रगति कर रहा है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सुदृढ़ हुआ है। कई शिक्षण संस्थान व अस्पताल राजमार्गों पर स्थित होने से यहां दिनभर भारी वाहनों का आवागमन रहता है। वाहन चालकों की ओर से पूरे दिन प्रेशर हार्न बजाने से विद्यार्थियों की पढ़ाई में और अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती मरीजों के स्वास्थ्य लाभ में काफी खलल पड़ा है। शहर में शिक्षा केन्द्रों का विस्तार होने के साथ ही ध्वनि प्रदूषण (नॉइज पॉल्यूशन) भी बढ़ता जा रहा है। साथ ही निर्माण कार्यों से होने वाला शोर भी शिक्षा व स्वास्थ्य लाभ में व्यवधान डालता है।
गांवों और अन्य शहरों से आते हैं विद्यार्थी

नागौर जिला मुख्यालय होने के कारण यहां आस-पास के गांव और बड़ी शिक्षण संस्थाएं होने के कारण अन्य जिलों के विद्यार्थी भी यहां अध्ययन के लिए आने लगे हैं। इन्हें एकाग्रता की जरूरत होती है। दिनभर हाइवे पर भारी वाहनों का आवागन व प्रेशर हार्न का अनावश्यक उपयोग करने से विद्यार्थी एकाग्र होकर अपना अध्ययन नहीं कर पाते हैं। जबकि पढाई के लिए शांतिपूर्ण माहौल की आवश्यकता होती है।
बीकानेर रोड पर हाइवे पर अस्पताल तो कॉलेज रोड पर शिक्षण संस्थाएं

शहर से गुजरने वाले तीनों हाइवे पर शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों का विस्तार हुआ है। बीकानेर रोड हाइवे पर कृषि महाविद्यालय, पॉलिटेक्निक कॉलेज, केन्द्रीय विद्यालय, स्वामी विवेकानन्द मॉडल स्कूल सहित कई निजी शिक्षण संस्थान भी है। साथ ही जिला मुख्यालय का सबसे बड़ा जेएलएन अस्पताल भी इसी हाइवे पर है। इसी तरह नागौर-जोधपुर हाइवे पर भी कई अंग्रेजी माध्यम स्कूलें संचालित हो रही हैं, जिनके परिसर हाइवे से लगते हुए हैं। मानासर तिराहे पर कई कोचिंग संस्थाएं संचालित है तो थोड़ा आगे जाने पर मिर्धा महाविद्यालय, महिला महाविद्यालय, विधि महाविद्यालय व कई कोचिंग संस्थाएं चल रही है। यहां फैल रहे ध्वनि प्रदूषण की तरफ ना पुलिस का ध्यान है और ना ही प्रशासन का विद्यार्थी अंदर पढ़ते रहते हैं और हाइवे पर पूरे दिन तेज ध्वनि में बचते हार्न व स्पीकरों की चिल्लपौ मची रहती है। यहीं हाल मूंडवा चौराहे का है यहां भी कई कोचिंग संस्थाएं संचालित है, जिनमें बच्चें पढऩे आते हैं और उन्हें शोरगुल भरे माहौल में एकाग्रता से नहीं मिल पाती है।
नो हार्न प्लीज का बोर्ड तक नहीं

शिक्षा संस्थानों के परिसर के आस-आस ध्वनि प्रदूषण रोकना तो दूर वहां नो हॉर्न प्लीज और साइलेंस प्लीज के बोर्ड व संकेतक तक नहीं लगे हैं। यहां से गुजरने वाले वाहन चालकों को यह तक पता नहीं होता कि यहां हार्न नहीं बजाना है।
क्या है ध्वनि प्रदूषण

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 65 डेसिबल से अधिक शोर को ध्वनि प्रदूषण के रूप में परिभाषित किया है। 75 डेसिबल से अधिक होने पर शोर हानिकारक हो जाता है और 120 से अधिक होने पर यह दर्दनाक साबित होता है। शहरों में सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण यातायात के शोर से होता है। कार का हॉर्न 90 डेसिबल और बस का हॉर्न 100 डेसिबल ध्वनि उत्पन्न करता है। इसी तरह बिल्डिंग निर्माण तथा सडक़ और फुटपाथ की मरम्मत के काम में बहुत शोर होता है। शोर लोगों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को प्रभावित करता है। इससे समय के साथ प्रदर्शन कम हो सकता है। याददाश्त पर प्रभाव पड़ता है।
ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के खिलाफ यातायात पुलिस व परिवहन विभाग कार्रवाई कर चालान बनाता है। जिसका कोर्ट जुर्माना तय करती है। कई बार भारी वाहनों के चालकों स्कूल व अस्पताल के आगे लगातार तेज हार्न नहीं बजाने के लिए पाबंद भी करते हैं। जहां संकेतक नहीं लगे हैं उनकी जांच कर पीडब्ल्यूडी को अवगत कराएंगे।
राजेन्द्रसिंह, प्रभारी, यातायात पुलिस, नागौर

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