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नागौर

धाम के प्रति आस्था जेनिफर को अमरीका से खींच लाई बुटाटी

राजस्थान Rajasthan के नागौर Butati Dham in Nagaur जिले में बुटाटी धाम Butati Dham पहुंची अमरीका के शिकागो निवासी जेनिफर सात दिन यहां ठहरकर देंगी परिक्रमा..

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एक संवाददाता कुचेरा/नागौर. लकवा (पाइरिलाइसिस) रोग paralysis treatment के महज सात परिक्रमा द्वारा प्राकृतिक उपचार के लिए प्रसिद्ध राजस्थान के नागौर जिले के बुटाटी धाम का संत चतुरदास महाराज मन्दिर देश के साथ-साथ विश्व में अपनी प्रसिद्धि बुलन्द कर रहा है। पाइरिलाइसिस रोग के प्राकृतिक उपचार की बात सुन विश्व की महाशक्ति अमरीका के शिकागो से लकवाग्रस्त पीडि़ता जेनिफर क्राफ्ट भी परिक्रमा लगाने बुटाटी मन्दिर पहुंची है। पत्रिका से खास बातचीत में जेनिफर क्राफ्ट ने मन्दिर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव के चलते यहां आने की बात कही।


सोशल मीडिया पर मिली जानकारी
उन्होंने बताया कि मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें बुटाटी धाम train for butati dham के बारे में पता चला, वे अमरीका से यहां चली आई। जेनिफर क्राफ्ट के साथ दिल्ली से आए आशुतोष शर्मा ने बताया कि क्राफ्ट का 2014 में बाईक एक्सीडेंट हो गया था। तब से रीढ की हड्डी में चोट के कारण उनका कमर से नीचे का हिस्सा हिल नहीं पा रहा है। बुटाटी धाम के बारे में सुनने के बाद से ही वे यहां आने की जिद कर रही थी। इसलिए रविवार को उन्हें यहां लाया गया।


देश भर से आते हैं पीडि़त
राजस्थान में नागौर से चालीस किलोमीटर दूर अजमेर-नागौर मार्ग पर कुचेरा कस्बे के पास स्थित बुटाटी धाम में चतुरदास जी महाराज Chaturdas maharaj Mandir का मंदिर है। यह मंदिर वस्तुत: चतुरदास जी की समाधि है। मान्यता है कि लगभग पांच सौ साल पहले संत चतुरदास जी का यहां पर निवास था। चारण कुल में जन्में चतुरदास एक महान सिद्ध योगी थे और अपनी सिद्धियों से लकवा के रोगियों को रोगमुक्त कर देते थे। आज भी लोग लकवा से मुक्त होने के लिए इनकी समाधि पर सात फेरी लगाते हैं। यहां पर देश भर से प्रतिवर्ष लाखों लकवा मरीज एवं अन्य श्रद्धालु विशेष रूप से एकादशी एवं द्वादशी के दिन आते है। No facilities for Butati Dham


सात दिन लगाते हैं परिक्रमा
यह मंदिर सात परिक्रमा द्वारा लकवा के रोग से मुक्त कराने के लिए प्रसिद्ध है। यहां लकवा के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगानी होती है। सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है। ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है। सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है। यहां मरीज के परिजन नियमित लगातार 7 मन्दिर की परिक्रमा लगवाते हैं। हवन कुण्ड की भभूति लगाते हैं और बीमारी धीरे-धीरे अपना प्रभाव कम कर देती है। शरीर के अंग जो हिलते डुलते नहीं हैं वह धीरे-धीरे काम करने लगते हैं।