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बिजली संकट से राहत पहुंचा सकता है मातासुख का कोयला

बाडमेर के बाद दूसरी सबसे बड़ी लिग्नाइट परियोजना -वर्ष 2004 से अब तक विभिन्न उपयोग के लिए सीमेंट फैक्ट्ररी, टैक्सटाइल उद्योग, ईंट भट्टा में आता रहा है उपयोग

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बिजली संकट से राहत पहुंचा सकता है मातासुख का कोयला

तरनाऊ (नागौर). मातासुख लिग्नाइट कोयला खदान।

नागौर जिले की प्रसिद्ध मातासुख- कसनाऊ लिग्नाइट परियोजना में कोयले का अथाह भंडार पड़ा है। राजस्थान में बाडमेर के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी परियोजना है।नागौर जिले इस कोयले को वर्ष 2004 से अब तक विभिन्न प्रकार के उपयोग के लिए सीमेंट फैक्ट्ररी, टैक्सटाइल उद्योग, ईंट भट्टा में उपयोग लिया जाता रहा है। हालांकि मातासुख खदान में निकलने वाले लिग्नाइट कोयले को पूर्व में सूरतगढ़ थर्मल में भी बिजली उत्पादन के लिए एक बार उपयोग में लिया गया था। सूत्रों की माने तो लिग्नाइट कोयले को अगर बिजली उत्पादन में काम में लिया जाए तो सरकार को यह कोयला कम लागत में बिजली उत्पादन दे सकता है, क्योंकि मातासुख लिग्नाइट कोयले में कार्बन की मात्रा बिटुमिनस कोयले के आसपास ही है।
एक जानकारी के अनुसार छतीसगढ़ से राजस्थान में आने वाले बिटुमिनस कोयले में कार्बन की मात्रा लगभग लिग्नाइट कोयले से दस प्रतिशत ही ज्यादा पाई जाती है। कोयला जलाने के दौरान कार्बन की मात्रा से ही कोयला कम व ज्यादा देर तक जलता रहता है।

बिजली उत्पादन में कोयले का उपयोग

जानकारी अनुसार बिजली उत्पादन के पावर प्लांट में कोयले को जलाकर पानी को भाप बनाने के काम में लिया जाता है। पानी भाप बनकर दूसरी यूनिट में लगे टर्बाइन को चलाया जाता है। टर्बाइन के साथ जुड़े अल्टीनेटर से बिजली उत्पादन होता है। इस प्रोसेस में कोयला जलाने के काम आता है। मातासुख लिग्नाइट खदान में निकलने वाला कोयला भी काफी ज्यादा ज्वलनशील है। गर्मी के दिनों में मांइस व कोयला गोदाम में पड़ा कोयला अपने आप जलना शुरू हो जाता है।

बिजली के खर्च को कम कर सकता है लिग्नाइट कोयला-
मातासुख लिग्नाइट खदान से अगर सरकार कोयले का ऑक्सन करे तो यह कोयला बिजली उत्पादन में काम आ सकता है। इस कोयले की खरीद से सरकार को कम रेट व ट्रांसपोर्ट का खर्च भी कम आएगा।

19 साल में निकला 40 लाख टन कोयला-

मातासुख लिग्नाइट कोयला खदान से बीस साल में आरएसएमएमएल की ओर से करीब चालीस लाख टन कोयला निकाला गया है। गौरतलब है कि वर्ष 2003 में मातासुख गांव में आरएसएमएमएल ने कोयला खदान की खुदाई शुरू की गई थी। वर्ष 2004 में आरएसएमएमएल की ओर से कोयला निकाल लिया गया, लेकिन इस दौरान माइंस में कोयले में पहले ही प्रचुर मात्रा में खारा पानी निकल आया। पानी को तोड़ कर भारी परेशानी का सामना करते हुए आरएसएमएमएल ने कोयला खनन जारी रखा। वर्ष 2010 तक आरएसएमएमएल मात्र साढे छ: लाख टन ही कोयला निकाल पाई। इस दौरान माइंस में बाधा बन रहे खारे पानी को मीठा कर जायल तहसील में देने का प्लान बना कर आरओ प्लांट बनाया गया। आरओ प्लांट 2009 में शुरू हो गया था। प्लांट में पानी की आपूर्ति देने के बाद मातासुख खदान में पानी कम होने लगा तो आरएसएमएमएल के लिए कोयला निकालने में आसानी होने लगी और वर्ष 2011 से मार्च 2022 तक आरएसएमएमएल ने साढे 33 लाख टन कोयला निकाल लिया गया।

कोयले की है प्रचुर मात्रा-
मातासुख लिग्नाइट कोयला खदान में आज भी लाखों टन कोयले का भंडार है, लेकिन खदान बीस माह से बंद होने से कोयले का खनन रूका हुआ है। वर्तमान में लिग्नाइट कोयले के भाव 2700 रुपए प्रति टन के आसपास है।

इनका कहना है
इस मामले को लेकर माइंस मैनेजर एसके बेरवाल ने बताया कि मातासुख लिग्नाइट खदान में लिग्नाइट कोयला निकलता है जो लिग्नाइट कोयला राजस्थान सहित देशभर में सप्लाई होता है। ऑक्सन के हिसाब से कोयले की आपूर्ति होती है। बिजली उत्पादन में इस कोयले के उपयोग व ऑक्सन को लेकर हमारे उच्चाधिकारी बता सकते हैं। मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है।