
Nagaur News : हादसों से सडक़ें लहूलुहान हो रही है। तमाम सरकारी कोशिश खारिज हो रही है। सारे नियम-कायदों को धता बताते हुए वाहनों की भागमभाग लोगों के लिए जानलेवा बन चुकी है। करीब चार साल में नागौर (डीडवाना-कुचामन) जिले में करीब दो हजार लोग इन हादसों की भेंट चढ़ चुके हैं। इस दौरान करीब सात हजार लोग हादसों में घायल हुए हैं। जागरुकता का आलम यह है कि तीन-चार साल में हादसे तक दोगुने हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार इस साल का अभी तीसरा महीना आधा भी नहीं बीता, लेकिन अब तक जिले में 107 जने सडक़ हादसे का शिकार होकर जान गवां बैठे हैं। रविवार को नागौर के चुडिय़ास-बच्छवास सरहद पर तेज रफ्तार कार ने एक ही परिवार के चार जनों को कुचल दिया। ऐसे हादसे आए दिन हो रहे हैं। जल्द पहुंचने की जद्दोजहद कहें या फिर बदलते जमाने की तेज रफ्तार, हादसों पर अंकुश लगाने के सारे उपाय असफल साबित हो रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि वर्ष 2023 में सडक़ हादसों की संख्या हजार के पार रही तो इनमें मरने वाले छह सौ तो घायलों की संख्या नौ सौ से अधिक थी। इससे पहले वर्ष 2022 में हादसे 708 हुए थे, जबकि मृतक 546 तो घायल 654 थे। वर्ष 2021 में तो हादसे 645 हुए जिनमें 460 लोगों की मौत हुई, जबकि घायलों की संख्या 519 थी। वर्ष 2020 में सडक़ हादसों के 564 मामले दर्ज हुए थे, इनमें मरने वालों की संख्या 418 रही, घायल आठ सौ से ज्यादा। यानी पिछले चार साल वर्ष 2020 से 2023 तक सडक़ हादसों में मरने वालों की संख्या करीब दो हजार के आसपास रही, जबकि घायल सात हजार से अधिक।
सूत्रों का कहना है कि किसी भी घटना व दुर्घटना में यही देखा जाता है कि वहां मौजूद अथवा गुजरते लोग बजाय हादसे में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के या तो उसका वीडियो बनाने लगते हैं या फिर पुलिस को सूचना देते हैं , ताकि उन पर कोई मुश्किल खड़ी ना हो। इसी देर-सवेर में बहुतों की जान चली जाती है। चिकित्सक खुद मानते हैं कि कई घायलों की मौत इसलिए हो जाती है कि समय पर उपचार नहीं मिलता, खून इतना बह जाता है कि उसे बचाना संभव नहीं हो पाता। हादसों की पचास फीसदी मौतें कम करने के सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने निर्देश दिए तो राज्य सरकार ने गंभीर घायल व्यक्ति के मददगार (गुड सेमेरिटन) को पुरस्कार व प्रशंसा पत्र देने की शुरुआत की गई।
सूत्र बताते हैं कि अधिकांश सडक़ हादसों में किसी घायल की मौत का सबसे बड़ा कारण यही है कि उसे समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जाता। लहूलुहान पड़े रहते हैं, खून बहना बंद नहीं होता और उनकी मौत हो जाती है। इसी वजह से मददगार को इनाम-प्रशंसा पत्र के साथ पुलिस की झंझटों से मुक्त करते हुए सरकार ने यह प्लानिंग की थी, लेकिन यह नागौर में अभी तक बेअसर है।
हादसों में घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाने पर मिलने वाला दस हजार रुपए का इनाम लोगों को रास नहीं आ रहा। पिछले चार साल में नागौर (डीडवाना-कुचामन) जिले के सडक़ हादसों में घायलों की संख्या सात हजार पार हो गई, लेकिन एक दर्जन लोग भी ऐसे नहीं मिले जिन्होंने घायल को अस्पताल पहुंचाकर इनाम का हकदार बनने की कोशिश की। जागरूकता की कमी या फिर पुलिस के झंझट से बचने के लिए ऐसा हो रहा है, यह किसी को समझ नहीं आ रहा। वर्ष 2021-22 के बजट में सडक़ हादसे के घायलों को अस्पताल पहुंचाने वाले मददगार को इनाम व प्रशस्ति-पत्र देने की घोषणा की गई थी, तब से नागौर में तो इनकी संख्या बमुश्किल दर्जन तक ही पहुंच पाई है। मददगार को दिया जाने वाला इनाम पांच हजार से बढ़ाकर दस हजार किए भी कई महीने हो गए पर पता नहीं किस पचड़े के डर से इसके लिए लोग आगे नहीं आ रहे। जबकि पिछले चार साल में सडक़ हादसे ही करीब चालीस फीसदी तक बढ़ गए।
पहले की तुलना में लोग इसके लिए आगे आ रहे हैं। जागरुकता बढ़ी है, लोगों को भी समझना चाहिए कि जरा सी कोशिश से किसी की जान बचती है तो इससे क्यों पीछे हटें। वैसे भी घायलों की मदद के लिए इनाम तो है ही पुलिस के झंझट से भी पूरी तरह मुक्ति है।
- डॉ महेश वर्मा, सीएमएचओ, नागौर
Published on:
12 Mar 2024 02:17 pm
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