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नावां शहर. महात्मा गांधी की ओर से निकाली गई दांडी यात्रा व आन्दोलन से आज नावां सहित आस पास के लाखों लोग अपनी रोजी रोटी कमा रहे है। अब अंग्रेजी हुकुमत तो चली गई लेकिन देश की ही सरकार की उदासीनता के चलते उत्तर भारत की सबसे बड़ी नमक मण्डी के हालात खराब है। सरकार की नीतियों के चलते नमक उद्योग में लगे लाखों लोग परेशानी झेल रहे है। आज नमक को वापस बापू की जरुरत आ पड़ी है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन की ऐतिहासिक दांडी यात्रा निकालकर नमक कानून के खिलाफ आन्दोलन किया था। अंग्रेजी हुकूमत के नमक कानून के खिलाफ निकली दांडी यात्रा अधिकारों की सजगता के प्रति देश ही नहीं, दुनिया के महत्वपूर्ण आन्दोलनों में शामिल है। समर्थकों के साथ नमक कानून तोडऩे के लिए 5 अप्रेल 1930 को महात्मा गांधी साबरमती आश्रम से दांडी के लिए रवाना हुए थे। महात्मा गांधी की इस यात्रा के आगे अंग्रेजी हुकूमत को भी झुकना पड़ा था तथा नमक कानून को समाप्त करना पड़ा। तब से नमक के ऊपर किसी भी प्रकार का कर नहीं लगाया जाता है। जिस नमक के लिए गांधीजी ने आन्दोलन व यात्रा की थी उसी नमक के पीछे आज नावां सहित आस पास के क्षेत्र के लाखों लोग अपना जीवन यापन कर रहे है। दो हजार से अधिक किसान नमक का उत्पादन कर पूरे देश को नमक की पूर्ति करवाते है।
नमक की लड़ाई थी दांडी यात्रा
यह नमक की लड़ाई थी, जिसके लिए बापू ने दांडी तक ऐतिसाहिक मार्च निकाला था। मार्च की शुरुआत 12 मार्च 1930 को हुई थी। इस मार्च को दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह से भी जाना जाता है। बापू ने अहमदाबाद से साबरमती आश्रम से 24 दिन की यात्रा शुरु की थी। 340 किमी. लम्बी यात्रा दक्षिण गुजरात में समुन्द्र किनारे बसे दांडी में सम्पन्न हुई। यहां बापू ने औपनिवेशिक भारत में नमक बनाने के लिए अंग्रेजों के एकछत्र अधिकारी वाला कानून तोड़ा और नमक बनाया था।
दांडी मार्च: ऐसे बीता था चुनौतियों से भरा सफर-
24 दिन में 340 किलोमीटर चले स्वतन्त्रता सेनानी दांडी पहुंचे और सुबह साढे छह बजे नमक कानून तोड़ा।
8000 भारतीयों को नमक सत्याग्रह के दौरान जेल में डाल दिया गया था।
सत्याग्रह आगे भी जारी रहा और एक साल बाद महात्मा गांधी की रिहाई के साथ खत्म हुआ।
इस आन्दोलन ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर और जेम्स बेवल जैसे दिग्गजों को प्रेरित किया।
दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली आन्दोलनों में शामिल।
अब नमक उद्योग उदासीनता का हो रहा शिकार
उत्तर भारत की सबसे बड़ी नमक मण्डी नावां की ही है। सरकार की उदासीनता के चलते नमक के किसानों व उद्यमियों को परेशानी हो रही है। नइन पांच वर्षो में नमक उद्योग पर संकट का काले बादल कभी छटे ही नहीं थे। इसी के साथ ही नावां नमक मण्डी अधिकांश भारत में नमक की आपूर्ति की जाती है लेकिन नमक उद्यमियों को समय पर मालगाडिय़ा उपलब्ध नहीं करवाई जाती है। नमक उद्यमियों के सामने रेलवे की सबसे बड़ी भारी समस्या रहती है।
नावां के नमक को बापू की आवश्यकता
नावां नमक उद्योग को बचाने के लिए आज बापू की वापस आवश्यकता आ पड़ी है। उस समय महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकुमत के सामने सत्याग्रह किया था लेकिन आज तक हमारे देश की ही सरकार के सामने सत्याग्रह करना पड़ेगा। नमक उद्योग को एक ओर सरकार की उदासीनता मार रही है वहीं दूसरी ओर अंग्रेजों की लगाई हुई सांभर साल्ट लिमिटेड मार रही है। सांभर साल्ट ने सांभर झील में अतिक्रमण करवाकर चन्द व्यापारियों को तो लाभ पहुंचा दिया लेकिन हजारों किसानों को बर्बाद करने का कार्य किया है।
इनका कहना-
महात्मा गांधी ने आन्दोलन कर नमक कानून को खत्म करवाकर अंग्रेजी हुकुमत को झुका दिया था लेकिन आज नमक उद्योग पर सरकार की नीतियों के चलते वापस खतरा मण्डरा रहा है। इसके लिए सरकार को सकारात्मक सोच के साथ कार्य करना चाहिए।- अनिल गट्टानी, अध्यक्ष, राजस्थान साल्ट रिफाइनरी एसोसिएशन।
वर्तमान में सांभर साल्ट भी अंग्रेजों की नीति पर ही कार्य कर रही है। समस्त व्यापारी जब एक जुट होकर विरोध कर रहे थे तो चन्द व्यापारियों को क्यार एलोट कर झील का अस्तित्व खत्म कर आपस में फूट डाल दी। सरकार को सांभर साल्ट के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर नमक उद्योग को बचाना चाहिए। सरकार को नमक किसानों के लिए विद्युत में भी रियायत बरतनी चाहिए क्योंकि नमक के किसान भी खेती ही करते है।- जयपाल पूनिया, अध्यक्ष, नमक उत्पादक संघ।
Published on:
02 Oct 2018 06:29 pm
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