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Nagaur patrika…सदियों की सरगम में सजी फक्कड़ गैर, होली पर नागौर की आत्मा का उत्सव

साढ़े तीन सौ वर्ष पुरानी परंपरा आज भी उसी अनुशासन, उसी उल्लास के साथ जीवंतराजाज्ञा से आरंभ हुई सांस्कृतिक धरोहर की यह परंपरानागौर. नागौर में पुष्करणा समाज की फक्कड़ गैर की शुरुआत लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व मानी जाती है। नागौर राज्यकाल में वीर गिरघर व्यास के समय राजाज्ञा से संगठित फागोत्सव की शुरुआत […]

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साढ़े तीन सौ वर्ष पुरानी परंपरा आज भी उसी अनुशासन, उसी उल्लास के साथ जीवंत
राजाज्ञा से आरंभ हुई सांस्कृतिक धरोहर की यह परंपरा

नागौर. नागौर में पुष्करणा समाज की फक्कड़ गैर की शुरुआत लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व मानी जाती है। नागौर राज्यकाल में वीर गिरघर व्यास के समय राजाज्ञा से संगठित फागोत्सव की शुरुआत हुई । जोधपुर से आकर बसे पुष्करणा समाज ने धर्म व संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से इस परंपरा को स्वरूप दिया। प्रारंभिक दौर में कुछ लोगों की भागीदारी से शुरू हुई, यह गैर आज सैकड़ों सहभागी जुटाने वाला आयोजन बन चुकी है। समय बदला, पीढिय़ां बदलीं, पर मूल स्वरूप और अनुशासन बरकरार रहा।

गणेश वंदना से होता है शुभारंभ
बसंत पंचमी से शीतलाष्टमी तक चलने वाले फागोत्सव में गणेश वंदना और राजाज्ञा गायन के बाद ही कार्यक्रम का प्रारंभ होता है। परंपरा के अनुसार विधिवत अनुमति के पश्चात ही गैर आगे बढ़ती है, जो इसकी मर्यादा और अनुशासन का प्रतीक है।
शिवरात्रि पर शिवबरात, एकादशी पर विष्णु रूप
महाशिवरात्रि पर फक्कड़ गैर शिवबरात का स्वरूप धारण करती है, जबकि आंवला एकादशी पर यह विष्णु रूप में निकलती है। निर्धारित मार्गों से गुजरती गैर प्रत्येक चौक और मंदिर पर तय रेखता, होरी और भैरव वंदना का गायन करती है। ढोल-नगाड़ों की थाप, पारंपरिक नृत्य, सामाजिक व्यंग्य और स्वांग फक्कड़ गैर को लोक संस्कृति का जीवंत दृश्य बनाते हैं। प्रत्येक भैरव मंदिर के समक्ष भैरु होरी का गायन इसकी विशिष्ट पहचान है। विभिन्न वाड़ों में पहुंचकर सगे संबंधियों को मीठी होरी की गार दी जाती है।
परंपरा में बदलाव नहीं, केवल समय का विस्तार
पहले पंचरंगी पावटा लगाकर गैर की सूचना दी जाती थी। आज सूचना के माध्यम बदल गए हैं, पर विधान और क्रम वही है। अंत में गणेश मंदिर में च्महाराज गजानंद फतेह करोज् के गायन के साथ विसर्जन होता है।
पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत विरासत
पुष्करणा समाज के रमेश व्यास बताते है कि वरिष्ठों के मार्गदर्शन और युवाओं के उत्साह ने इस परंपरा को निरंतर बनाए रखा है। रंग, व्यंग्य और अनुशासन से सजी फक्कड़ गैर आज भी वैसी ही निकलती है, जैसी साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व आरंभ हुई थी—नागौर की सांस्कृतिक आत्मा की सजीव अभिव्यक्ति।
परंपरा में मार्ग व समय का परिवर्तन
फक्कड़ गैर पूर्व में वैद्यनाथ महादेव मानासर तक जाया करती थी। परंपरागत मार्ग के अनुसार गैर निर्धारित चौकों और मंदिरों से होती हुई मानासर स्थित वैद्यनाथ महादेव मंदिर पहुंचती थी। करीब पंद्रह वर्षों से इसके अंतिम पड़ाव में परिवर्तन हुआ है और अब यह गैर शिवबाड़ी मंदिर तक ही पहुंचती है। आयोजन की संरचना और गायन क्रम यथावत रखते हुए मार्ग में यह आंशिक बदलाव किया गया है। समय की दृष्टि से भी परिवर्तन दर्ज हुआ है। पहले फक्कड़ गैर सुबह लगभग छह बजे तक चलती थी, जबकि वर्तमान में इसका समापन लगभग रात दो बजे तक हो जाता है। यद्यपि मार्ग और समय में परिवर्तन हुआ है, तथापि परंपरा का मूल स्वरूप, निर्धारित गायन शैली और धार्मिक अनुक्रम पूर्ववत् बनाए रखा गया है।
पुष्करणा समाज बोला……..परंपरा जारी है
लगभग 350 वर्षों से शिवबरात और फक्कड़ गैर की परंपरा निरंतर जारी है।
राजा साहब-पुखराज व्यास -पुष्करणा समाज
शिवरात्रि पर शिव रूप और आंवला एकादशी पर विष्णु रूप में गैर निकाली जाती है।
संजय कुमार व्यास -पुष्करणा समाज
फक्कड़ गैर सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अनुशासन का प्रतीक है।
घनश्यामलाल आचार्य - पुष्करणा समाज
ढोल-नगाड़ों और मीठी होरी के साथ शहर में उत्सव का अनोखा वातावरण बनता है।
ओमप्रकाश मूथा -
विशिष्ट स्थान….
बंसत पंचमी से शीतलाष्टमी तक चलने वाला पौराणिक पुष्करणा फागोत्सव नागौर की होली उत्सव परम्परा में विशिष्ट स्थान रखता है। वीर सेनापति गिरधर व्यास की सांस्कृतिक देन आज भी समाज की पहचान बनी हुई है। व्यास व मूथा दल के रूप में विभक्त समाज का होली गायन एवं रंगों का पारंपरिक झगड़ा शहरवासियों के लिए मुख्य आकर्षण होता है, जिसे देखने बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़ते हैं।

गोविन्द लाल मूथा, अध्यक्ष, पुष्टिकर पंचायत, नागौर