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पत्थरों के बीच खांसते हुए खत्म हो रही खनन मजदूरों की जिंदगी

ग्रामीण इलाकों में पत्थर खदानों के मजदूरों की पीड़ा न चिकित्सा सुविधा न पीने को मिलता स्वच्छ पानी मजदूरों को नहीं मिलते सुरक्षा उपकरण ग्रामीण क्षेत्र में 61 लीजधारी खानें

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पत्थरों के बीच खांसते हुए खत्म हो रही खनन मजदूरों की जिंदगी

रियांश्यामदास की पत्थर की खान

मेड़ता उपखंड के ग्रामीण इलाकों में लम्बे समय से पत्थर खनन का कार्य चल रहा है। पत्थर खनन से हर साल कम्पनियां करोड़ों-अरबों रुपए कमा रही है। लेकिन इन खदानों में काम करने वाले मजदूरों की जिंदगी पत्थरों के बीच खांसते व बीमार होकर खत्म हो रही है। मजदूरों के हितों को लेकर कोई ध्यान हीं दे रहा है।

क्षेत्र में 61 पत्थर की खानें
रियांश्यामदास, भीलावास, बाकलियावास, नोखा चांदावता, हरसोलाव, ताडों की ढाणी, धनापा, मांगलियावास आदि गांवों में कुल 61 पत्थर की स्वीकृत खदाने हैं। रियांश्यामदास स्थित पत्थर की खदानों से सदियों पत्थर निकाला जा रहा है।

रेलवे स्टेशनों में लिया काम
मेड़ता रोड व जोधपुर के बीच जो रेलवे स्टेशन बने हुए हैं, उनमें रिंयाश्यामदास की खानों के पत्थर काम लिए गए थे। खानों में पहले अधिकतर स्थानीय ग्रामीण ही मजदूरी करते थे। वर्तमान में मशीनरी का उपयोग होने से मजदूरों की संख्या घटी है।

हाड़तोड़ मेहनत पर बाजिव मजदूरी नहीं
कस्बे सहित आसपास के गांवों की पत्थर की खदान में काम करने वाले मजदूर पूरे दिन हाड़तोड़ मेहनत करते हैं ,लेकिन न तो उन्हें बाजिव मजदूरी मिलती है और ही जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं। भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय जिन शर्तों पर इन खदान की लीज की अनुमति देता है उनकी पालना यहां नजर नहीं आती है। खानों पर मजदूरों के मानवीय हितों का भी ध्यान नहीं रखा जाता है। पत्थर खदानों में काम करने वाले मजदूरों में से हर साल आधा दर्जन मजदूरों की मौत सिलकोसिस बीमारी से हो जाती है। वहीं तीन- चार मजदूरों की मौत दुर्घटना में । विभागीय रिपोर्ट में इसका खुलासा होने के बाद भी खदान क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की हालत नहीं सुधरी है।

गंदे ड्रमों में भरा पानी पीते हैं मजदूर
खदान में काम करने वाले मजदूरों के लिए स्वच्छ पेयजल तक का इंतजाम नहीं है। मजदूर यहां प्लास्टिक के कांई लगे ड्रमों मेंं भरे गए हैंडपंप के पानी को पीते हैं। दोपहर के भोजन के बाद मजदूर पत्थरों के नीचे रखे ड्रमों का पानी पीते मिले। एक मजदूर ने बताया कि जिस पानी से लोग नहाना भी पसंद नहीं करते, मजबूरी मेंं उस पानी को हम लोग पी रहे हैं।

नहीं है कोई चिकित्सा सुविधा
इन खानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए यहां किसी प्रकार की चिकित्सा की सुविधा नहीं है। थोड़ी सी तबीयत खराब होने पर गोटन या मेड़ता ले जाना पड़ता है।

छाया और आराम की भी नहीं जगह
मजदूरों के लिए धूप और बारिश से बचाव के लिए कोई सुविधा नहीं है। पत्थरों को आड़ बनाकर यहां छाया की व्यवस्था की गई है, जिसके नीचे पानी के खुले ड्रम रखे रहते हैं। इसी के नीचे बैठकर मजदूर भोजन करते हैं। खदान क्षेत्र में मजदूरों के लिए जो टीनशेड बने हैं वहां मशीने रखी रहती है। चट्टानों के नीचे खतरें में ही मजदूरों का जीवन कट रहा है।

करीब 25 साल से पत्थर खदान में काम कर रहे एक मजदूर ने बताया कि सालों से उनका जीवन ऐसे ही चल रहा है। खुले में पड़ा पानी पीकर हर माह कोई न कोई मजदूर बीमार हो जाता है। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी कोई सुविधा नहीं है। एक बार बीमार होने पर पूरी कमाई इलाज में लग जाती है।
फेंफड़ों में भरती है डस्ट, नहीं है सुरक्षा इंतजाम

खदान मजदूरों की सुरक्षा के लिए हेलमेट दिए जाते हैं, लेकिन यहां के ग्रामीण क्षेत्र की खदानों में काम करने वाले मजदूरों को कोई हेलमेट नहीं मिलता। मास्क, ग्लब्स, जूते सहित अन्य सुरक्षा उपकरण भी मजदूर को नहीं मिलते हैं। डस्ट उड़ने से कई श्रमिक सिलकोसिस बीमारी के शिकार हो गए हैं।
इनका क्या कहना
खनन लीजधारी की जिम्मेदारी

पत्थर की खदान में काम करने वाले मजदूरों को सभी मूलभूत सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्हें सुरक्षा मानकों के अनुसार सुरक्षा उपकरण देने चाहिए। लेकिन यह सभी जिम्मेदारियां खनन लीज मालिकों की है। अवैध खनन को लेकर कोई शिकायत आती है तो हम कारवाई करते हैं।
मनोज कुमार, सहायक अभियंता खनिज विभाग, गोटन।