18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

VIDEO…तो फिर इतिहास में कैद हो जाएंगे क्या देशी नस्ल के गोवंश

Nagaur. पशुपालन विभाग की ओर से देशी गोवंश के उन्नयन एवं पालकों को इसके लिए प्रोत्साहित न करने के चलते अब स्थिति विकट होने लगी है। दुग्ध उत्पादन की होड़ में ज्यादातर पशु पालकों के पास अब देशी नहीं, बल्कि संकर नस्ल के गायों का चलन पिछले दस सालों के अंतराल में तेजी से बढ़ा है।

2 min read
Google source verification
Nagaur news

Then will the indigenous breed of cattle be imprisoned in history

दुग्ध उत्पादन की होड़ में संकर नस्ल गोवंशों की संख्या बढ़ी
पशुपालन विभाग की ओर से संकर नस्ल के गोवंशों के आंकड़ों को बताने से जरूर इंकार कर दिया गया है, लेकिन अनाधिकृत सूत्रों के अनुसार संकर नस्ल के वर्ष 2019 में हुई गणनानुसार दो लाख 22 हजार 901 बताई गई थी, लेकिन इस आंकड़े की पुष्टी पशुपालन विभाग के अधिकारियों की ओर से नहीं की जा सकी। जानकारों का कहना है कि यह आंकड़े अजमेर के राजस्व विभाग की ओर से नस्लवार कराई गई गणना के ही हैं, लेकिन इनके आंकड़ों को संबंधित विभाग की ओर से अधिकृत तौर पर अब तक जारी नहीं किए जाने के कारण इस पर टिप्पणी नहीं की जा सकती है। विशेषज्ञों की माने तो दुग्ध व्यवसाय में आगे बढऩे की होड़ के चलते गत पांच से दस सालों के अंतराल में संकर नस्ल के गोवंशों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सरकार या विभाग की ओर से इस संबंध में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाने के कारण अब हालात देशी गोवंशों के लिए पहले से भी ज्यादा विकट होने लगे हैं।
देशी व संकर नस्ल के गायों में यह है अंतर
विदेशी नस्ल की गायों के सींग सीधे तथा बाहर की ओर निकले होते हैं , जबकि देसी गाय की नस्लों के सींग ऊपर की ओर निकले होते हैं । इनमें जर्सी गाय की पहचान करना बेहद आसान होता है। इस गाय का रंग हल्का पीला होता है। जिस पर सफेद रंग के चित्ते बने रहते हैं। इसके किसी-किसी का रंग हल्का लाल या बादामी भी होता है। इसके साथ ही इस गाय का सिर छोटा, पीठ एवं कन्धा एक लाइन में होते हैं। संकर नस्ल की गाय की दुग्ध क्षमता देशी गाय की अपेक्षा ज्यादा होती है। इस वजह से पालक देशी की जगह संकर नस्ल की गायों का पालन ज्यादा करते हैं।
इनकी दुग्ध क्षमता भी कम नहीं, फिर नहीं बढ़ रहे
पशुपालन विभाग के अनुसार देश में में गाय की 30 से अधिक नस्लें पाई जाती हैं। इनमें लाल सिन्धी, साहिवाल, गिर, देवनी, थारपारकर आदि नस्लें भारत में दुधारू गायों की प्रमुख नस्लें हैं। इन गायों की दुग्ध क्षमता संकर नस्ल के गायों से किसी भी तरह से कमतर नहीं पड़ती है। इसके बाद भी इनकी संख्या कम ही नजर आती हैं।इनमें भी गिर गाय देश की सर्वाधिक दुधारु गायों में मानी जाती है। बताते हैं कि गाय की ये नस्ल दिनभर में 50-80 लीटर और सालभर में 2400 से 2600 लीटर दूध का उत्पादन करती है। लाल रंग की बड़े थन वाली गिर गाय के कान लटकदार और लंबे होते हैं। इस संबंध में पशुपालन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अब देशी गोवंशों में दुधारु गोवंशों की नस्ल को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय कृतिम गर्भाधान के तहत काम किया जा रहा है। इसके बाद भी हालांकि बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन आंशिक स्तर पर सफलता जरूर मिली है। कई जगहों पर अब पालक थारपारकर एवं गिर आदि नस्ल के गोवंशों का भी पालन करने लगे हैं।
इनका कहना है...
राष्टीय पशु कृतिम गर्भाधान के तहत देशी गोवंशों के नस्लीय संवर्धन के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। पहले से स्थिति बेहतर हुई है। विभाग के पास संकर नस्ल एवं देशी गोवंशों की अलग-अलग संख्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। इसलिए संख्यात्मक तौर पर किसकी संख्या ज्यादा है कि टिप्पणी नहीं की जा सकती है।
डॉ. महेश कुमार मीणा, संयुक्त निदेशक पशुपालन नागौर