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VIDEO…शहर के प्रमुख तालाबों में गंदगी के साथ पहुंच रहा नाले-नालियों का पानी

-तालाबों में गंदे पानी के पहुंचने से जैविक प्रदूषण के साथ ही पर्यावरणीय खतरा बढ़ा

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Nagaur news

Water from drains along with filth is reaching the major ponds of the city

-जानकारी होने के बाद भी जिम्मेदार नहीं कर रहे कोई कार्रवाई
शहर के कई नालों का जा रहा गंदा पानी नहीं रोक रहे जिम्मेदार, खत्म हो रहे तालाब
शहर के समस तालाब, गिनाणी तालाबा, प्रतापसागर एवं बख्तासागर में जा रहा गंदा नाला का पानी
-गंदा पानी जाने के कारण इन तालाबों का पानी हुआ काला, इनके किनारों पर अब चारों ओर बना दिया गया अघोषित कचरा डिपो
-तालाबों में कचरा डाले जाने के चलते अब समस तालाब, प्रतापसागर का दायरा भी दिनों-दिन घट रहा
नागौर. शहर के परंपरागत जलस्रोतों का अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो गया है। बरसों से लोगों की प्यास बुझाने के साथ ही भूजल का संतुलन बनाए रखने वाले तालाबों में गंदा नाला का पानी जा रहा है। इसकी वजह से तालाब ही नाला में बदलता जा रहा है। इसकी वजह से शहर के प्रमुख तालाबों की हालत अब गंदे नाले के रूप में बदलने लगी है। तालाबों के गंदे नाले के पानी में बदलने के साथ ही न केवल इन तालाबों की जैविक स्थिति बदलने लगी है, बल्कि यह भूजल के साथ ही पर्याववरण को भी निगलने लगा है।
नालों के माध्यम से जा रहा गंदा पानी अब शहर के गिनाणी तालाबा, बख्तासागर एवं समस तालाब सहित आसपास के तालाबों को निगलने लगा है। बताते हैं कि यह स्थिति पिछले दो से तीन सालों से लगातार बनी हुई है। इसके कारण अब इन तालाबों एवं गंदे नालों के पानी में कोई अंतर नहीं रह गया है। देखने से यह तालाब भी अब गंदे नालों के रूप में नजर आने लगे हैं। गंदा पानी जाने के साथ ही अब इन तालाबों में अघोषित तौर पर कचरा भी डालने का काम शुरू कर दिया गया है। इस स्थिति का अंदाजा इन तालाबों को देखकर खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है। कचरा केवल तालाब के अंदर ही नहीं, बल्कि इनके किनारों पर भी डाला जा रहा है। इसकी वजह से तालाबों का दायरा भी कम होने लगा है। फिलहाल समस तालाब का दायरा इन तालाबों से ज्यादा बड़ा है, लेकिन अब यह भी पहले से काफी कम हो गया है। जानकारों की माने तो इसके आसपास के यानि की चारो ओर तकरीबन पांच सौ मीटर के दायरे में अब कचरा डालकर तालाब का पानी ही सुखा दिया गया है। अब वहां पर किनारों की ओर अघोषित कचरा डिपो भी बना दिया गया। लोगों ने भी अब यहां पर कचरा ही फेकना शुरू कर दिया। यही स्थिति प्रतापसागर तालाब की बन गई है। इसके चारो ओर गंदा कचरा डालने का काम तेज कर दिया गया है। स्थानीय बाशिंदों की माने तो पहले इस तालाब का पानी आसपास के क्षेत्रों में पेयजल के रूप में उपयोग में लिया जाता था। इस तालाब का पानी देखने पर इसके नीचे तक की चीज साफ तौर पर नजर आती थी, लेकिन ऐसी स्थिति नहीं रही। इस तालाब में भी लंबे समय से गंदा नाली का पानी जाने के कारण यह पूरा तालाब ही गंदे नाला में बदल गया है। इसका पानी अब साफ की जगह पूरी तरह से काला हो गया है। तालाब के किनारे के पास खड़े होने पर ही मृत जानवरों एवं सड़ते कचरे की दुर्गन्ध आती है। इस तालाब के किनारों में चारों ओर केवल गंदा, और बिखरा सड़ता कचरा ही नजर आता है। इसी तरह बख्तासागर तालाब की स्थिति भी होने लगी है। आवासीय क्षेत्रों का गंदा पानी सीवरेज में जाने की जगह तालाब के आसपास बने दीवारों के माध्यम से बख्तासागर तालाब में जा रहा है। हालांकि पूर्व में इस स्रोत को बंद कर दीवार की मरम्मत करा दी गई थी, लेकिन कुछ दिनों के बाद फिर से वही स्थिति बन गई। अब बख्तासागर तालाब का भी पानी भी काला होने लगा है। इनमें गिनाणी तालाब की स्थिति तो सर्वाधिक खराब हो चुकी है। इसके चारो ओर के किनारों में कचरा डाले जाने के साथ ही बताते हैं कि गंदे पानी के कई स्रोत सीधा इसमें गिर रहे हैं। इसके चलते इस पूरे तालाब का पानी भी गंदा हो चुका है। दूर से ही देखने पर यह तालाब की जगह गंदा नाला के रूप में नजर आने लगा है।
पानी के लिए गंदगी व कचरा होता है खतरनाक
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण का मुख्य स्रोत गारबेज यानि की जो पानी में कूड़ा-करकट, गन्दगी मिला दी जाती है। इस गंदगी में भारी धातुएँ जैसे निकिल, क्रोमियम, कोबाल्ट, कैडमियम, लेड भी पाये जाते हैं। यह काफी हानिकारक हैं। इन धातुओं के कारण फाइटो टॉक्सीसिटी लेवल अधिक हो जाता है। इससे यह पेड़ों और मनुष्यों में रोग उत्पन्न करते हैं। गारबेज के सडऩे पर विखण्डन होने पर गैसें निकलती हैं। वातावरण में खतरनाक प्रभाव छोडऩे के साथ ही जो दुर्गन्ध उत्पन्न कर, पर्यावरण को भी प्रदूषित करती हैं्र। गारबेज के जल में मिलने से जल पूरी तरह से प्रदूषित हो जाता है।
विशेषज्ञ बोले: अनुपयोगी और खतरनाक हो जाता है
कृषि महाविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्री डॉ. विकास पावडिय़ा के अनुसार साफ पानी को पशु तथा पेडो़ में देने के लिए तथा कई जगह पीने के लिए काम में लिया जाता है। गंदे नालों का पानी पीने योग्य नहीं रहता है। इसमें मिले वेस्ट मैटेरियल जानवरों व मानव के लिए हानिकारक होता है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि इससे भूजल के प्रदूषित होने के साथ ही कई अन्य प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव भी पड़ता है। औद्योगिक अपशिष्ट एवं बहिस्राव में मौजूद विषैले पदार्थ जलीय गुणवत्ता को नष्ट कर देते हैं। इसलिए जरूरी है कि घरों से निकलने वाले मलिन जल एवं वाहित मल को एकत्रित कर संशोधन संयंत्रों में पूर्ण उपचार करने के साथ ही कुओं, तालाबों के चारों ओर दीवार बनाकर विभिन्न प्रकार की गन्दगी को रोका जाना चाहिए। इसके साथ ही जलाशयों के आस-पास गन्दगी करने, गंदे पानी जाने पर रोक लगानी होगी। अपशिष्टों का बिना उपचार किये जलस्रोतों में विसर्जित करने पर रोक लगाने का काम करना होगा, तभी बात बनेगी।
इनका कहना है...
गंदा पानी तो सीवरेज प्लांट में जाता है। ऐसा नहीं है, और न ही तालाबों में गंदा पानी जाने वाला कोई सामने नहीं आया है। यदि ऐसा है तो फिर इसकी जांच कराकर यथोचित कदम उठाया जाएगा।
देवीलाल बोचल्लया

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