
खींवसर। आज पूरा देश महिला दिवस मना रहा है। महिलाओं के अधिकारों को लेकर विचार गोष्ठियां सहित अनेक आयोजन होंगे, लेकिन महिलाओं को उन्हें कितने अधिकार मिले यह गांवों में महिलाओं की दैनिक दिनचर्या बता रही है। बच्चों का लालन पोषण व घर का चौका चूल्हा करने के बाद महिलाओं को दिनभर नाडी तालाब से मिट्टी निकालनी पड़ती है। मनरेगा के आंकड़े महिलाओं की स्थिति को चौंका रहे हैं।
मनरेगा में महिलाओं का इस वर्ष का आंकड़ा 74.91 है। यही नहीं पिछले पांच-दस वर्षों से यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। पुरुष मजदूरी छोड़ रहे हैं और कामकाजी महिलाओं को गृहस्थी के काम के बाद मजदूरी के लिए जाना पड़ रहा है। महिलाओं को सरकार की ओर से दिए गए आरक्षण एवं अधिकारों का दावां यहा फेल होता नजर आ रहा है।
घर की गाड़ी हांकने में जिम्मेदार पुरुष मजदूरी से किनारा कर रहे हैं और महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। मनरेगा में जिले में काम कर रहे 7 लाख 60 हजार मजदूरों में से महिलाओं की संख्या 5 लाख 69 हजार 316 है। जबकि पुरुषों की संख्या केवल 1 लाख 90 हजार 684 है। यही स्थिति राजनीति में निर्वाचित तो महिलाओं का है परन्तु पंचायती पुरुष कर रहे हैं। महिलाओं के अधिकार कागजों में दम तोड़ रहे है।
मनरेगा में पत्थर तोड़ने एवं मिट्टी निकालने के काम में महिलाओं को अधिक लगाया जा रहा है। जबकि मेट के काम में महिलाओं की भागीदारी ना के बराबर है।
यह सही है कि मनरेगा में महिला श्रमिकों की संख्या पुरुषों से काफी अधिक है। हर वर्ष महिला मजदूरों की संख्या पुरुषों की तुलना में बढ़ रही है। हालांकि यह मांग आधारित योजना है ऐसे में हम तो कुछ नहीं कर सकते फिर भी महिला अधिकारों को लेकर जागरूक करने का लगातार प्रयास कर रहे है।
-श्रवणराम प्रजापत, सहायक विकास अधिकारी
महिलाओं को सरकार ने अधिकार दिए है तो उनकी प्रभावी मॉनेटरिंग होनी चाहिए। नरेगा में महिलाओं को मेट बनाने के साथ राजनीति मेें निर्वाचन के साथ महिलाओं की ही पंचायती होनी चाहिए।
-काजल चौधरी, अधिवक्ता, राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर
Published on:
08 Mar 2025 09:35 am
बड़ी खबरें
View Allनागौर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
