
हरिश शर्मा.
बोरावड़ विधवाओं की मांग को सिंदूर व उपहार राशि को आवेदकों का इंतजार है। सरकार के प्रोत्साहन के बावजूद भी विधवाओं का हाथ थामने वालों कम ही नजर आ रहे हैं। दरअसल, विधवाओं के कल्याण एवं विधवा विवाह को लेकर सामाजिक न्याय व अधिकारिकता विभाग की ओर से वर्ष 2007-08 में विधवा विवाह उपहार योजना शुरू की थी, लेकिन प्रचार-प्रसार, शिक्षा की कमी व सामाजिक बंधन के आगे योजना कारगर साबित नहीं होकर दम तोड़ती रही है। इस योजना को लेकर जिले में कोई खास रूचि नहीं है।
अब तक छह ने उठाया लाभ
वर्ष 2007 से 2016 तक करीब नौ वर्ष में विधवा विवाह उपहार योजना का लाभ जिले में अब तक केवल छह महिलाओं ने ही उठाया है। इसके पीछे कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन विभाग के प्रचार- प्रसार के कारण आज भी कई लोगों को योजना की जानकारी नहीं है।
वर्ष वार जिले की स्थिति
वर्ष 2007-08 में 2 आवेदन प्राप्त हुए तथा दोनों ही स्वीकृत हुए। वर्ष 2008-09 में एक आवेदन प्राप्त हुआ एक को ही स्वीकृति मिली
वर्ष 2009-10 में 3 आवेदन प्राप्त हुए जिसमें से 2 को स्वीकृति। वर्ष 2010-11 में एक आवेदन मिला तथा उसे ही स्वीकृति मिली।
वर्ष 2011-12 में एक भी आवेदन नहीं मिला।
वर्ष 2012-13 में एक आवेदन मिला जो लम्बित चल रहा है।
वर्ष 2013-14 में भी एक आवेदन मिला जो लम्बित चल रहा है। वर्ष 2014-15 में भी एक ही आवेदन प्राप्त नहीं हुआ।
यह है योजना
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिकता विभाग की ओर से विधवा विवाह उपहार योजना नियम 2007 बना। इसके तहत ऐसी महिला, जिसके विवाह के बाद पति का देहान्त हो गया हो गया हो और वह वैधव्य जीवन व्यतीत कर रही हो एवं उसने पुनर्विवाह नहीं किया हो। उस महिला को लाभान्वित करने का प्रावधान किया गया है। 18 से 50 वर्ष तक की विधवा महिला को पुनर्विवाह करने पर शादी के मौके पर उपहार स्वरूप पन्द्रह हजार रूपए देने का प्रावधान है।
शिक्षा की कमी, ग्रामीण परिवेश
सामाजिक परम्परा के साथ अशिक्षा भी विधवा पुनर्विवाह के लिए बाधा है। विधवा विवाह के सम्बन्ध में मिथ्या मान्यताएं हैं। ऐसे में सामाजिक धारणा के चलते विधवा दूसरी शादी नहीं कर पाती। महिला शिक्षा की कमी व ग्रामीण परिवेश में मिथ्या मान्यता के चलते कई बाल विधवा चाहकर भी पुनर्विवाह नहीं कर सकती।
योजना का होता प्रचार प्रसार
विभाग की ओर से विधवा विवाह उपहार योजना का प्रचार-प्रसार किया जाता है, लेकिन शिक्षा की कमी, ग्रामीण परिवेश व परम्परा के अनुरूप विधवा पुनर्विवाह में रूचि कम दिखा रही है। हालांकि कई जातियों में नाता प्रथा प्रचलित है, लेकिन नियमानुसार उन्हें योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता। अब तक योजना से जिले में करीब छह महिलाओं को लाभ मिला है।
अनिल व्यास, स. निदेशक, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिकता विभाग, नागौर
बड़ी खबरें
View Allट्रेंडिंग
