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टाइगर ऑफ नर्मदा महाशीर मछली अंधाधुंध शिकार व खनन से संकट में

नहीं हो रहे बचाव के उपाय,नर्मदा-तवा नदी में इनकी संख्या 30 से घटकर 2 फीसदी तक आ गई,नदी के प्रवाह-गहराई में कमी और टूट रही धार से भी पड़ रहा असर

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टाइगर ऑफ नर्मदा महाशीर मछली अंधाधुंध शिकार व खनन से संकट में

टाइगर ऑफ नर्मदा महाशीर मछली अंधाधुंध शिकार व खनन से संकट में

नर्मदापुरम्. नर्मदांचल की नर्मदा के मीठे पानी की महाशीर यानी बाड़स मछलियां विलुप्त होती जा रही है। इसके बचाव व संरक्षण के अब तक कोई प्रयास नहीं हुए है। अंधाधुंध शिकार भी लगातार जारी है। नर्मदा में यह पहले अन्य मछलियों की तुलना में 30 फीसदी थी, जो अब घटकर मात्र 2 फीसदी रह गई है। बता दें कि नर्मदा-तवा नदियों को साफ और स्वच्छ बनाए रखने में बाड़स (महाशीर) मछलियों की अहम् भूमिका होती है, लेकिन यह भी अब विलुप्ति की कगार पर है। बाड़स के अलावा समल, रोह और नरेन प्रजाति की मछलियों की संख्या भी बेहद कम हो चुकी है। अत्यधिक शिकार के साथ ही नर्मदा में रेत के लगातार उत्खनन से मिट्टी-कपा बढ़ रहा है। इससे नर्मदा के पानी के बहाव व गहराई में भी कमी आ रही है। शहरों की सीवेज गंदगी और तटीय खेतों से रासायनिक खाद युक्त नर्मदा में बहाए जा रहे पानी के असर से भी मछलियों का जीवन संकट में पड़ गया है। मत्स्य विभाग के पास मछलियों के संरक्षण व संवर्धन की कोई योजना ही नहीं है, जबकि मुख्यमंत्री ने टाइगर ऑफ वाटर और स्टेट दर्जा देकर इस मछली को संरक्षण के लिए निर्देश दिए थे। सिर्फ बारिशकाल के सीजन में प्रशासन इनके प्रजनन काल में ही मत्याखेट पर प्रतिबंध लगाता है।


ये मछलियां हो रही विलुप्त
नर्मदापुरम् जिले में नर्मदा-तवा मुख्य नदी है, जिसमें रोहू, कतला, नरेन, बाम, दिगड़ा, बाड़स (महाशीर), कालोट, बंगाली, पडऩ, दीगर, कामन कार्प प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी, जो अब लगातार शिकार होने से विलुप्त होने की स्थिति में आ चुकी है। इनमें बाड़स, रोहू और नरेन पर ज्यादा संकट है। दरअसल ठेकेदार डेम से मछलियों को नदियों में जाने से रोक देते हैं। पावडर डालकर भी मछलियों का शिकार होता है।

अंधाधुंध खनन का भी असर
मछलियों की विलुप्तता में रेत का अंधाधुंध खनन भी मुख्य कारण है। रेत को नदी से निकाल लेने से इसकी जगह मिट्टी-कपा और मलबा जम जाता है। जिसमें मछलियां पलायन कर जाती है, जबकि मछलियां नर्मदा-तवा की तलहटी में जलीय वनस्पतियों के बीच में रहना पसंद करती हैं।

इनका कहना है...
नर्मदा व तवा में मीठे पानी के कारण इसमें बाड़स यानी महाशीर जिसे टोर-टोर के नाम से भी जाना जाता है। इसकी संख्या में लगातार कमी आ रही है, जो चिंता का विषय है। अंधाधुंध रेत खनन, खेतों के रासायनिकयुक्त पानी, सीवेज के पानी से इनके जीवन पर संकट बढ़ा है। स्टेट मछली का दर्जा प्राप्त महाशीर के शिकार पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। इसके संरक्षण व संवर्धन के सामूहिक तौर पर प्रयास से ही इसके अस्तित्व को बचाया जा सकेगा।
-अशोक विस्वाल, नर्मदा पर्यावरण विशेषज्ञ-शोधकर्ता

आवासीय क्षेत्रों में सीवेज लाइन के लिए शुरू हो गया सर्वे
नर्मदापुरम् शहर में नर्मदा के प्रदूषण व नालों से मिल रही गंदगी को रोकने के लिए आवासीय क्षेत्रों में सीवेज लाइन डालने के लिए सर्वे तेज हो गया है, नर्मदा जयंती के दिन भी ठेका कंपनी के कर्मचारी कॉलोनियों में सर्वे करते नजर, सर्वे व मकानों से लाइन की दूरी की नपाई का काम उपनगर हाऊसिंग बोर्ड क्षेत्र से शुरु हुआ है।

प्रवासी पक्षियों ने बनाया स्थाई रहवास-डेरा
नर्मदापुरम्. जिले में नर्मदा के किनारों एवं इसकी तलहटी में छाई हरियाली के बीच सुंदर प्रवासी पक्षियों ने भी अब अनुकूल वातावरण व भरपूर भोजन-पानी मिलने के कारण स्थाई रूप से डेरा बना लिया है। यहां के इको सिस्टम व जैवविविधता इन पक्षियों को भा रही है। यही वजह है कि इनकी चहचहाहट रोजाना सुबह-शाम सुनाई देती है। जब लोग स्नान एवं पूजन करने नर्मदा तटों पर जाते हैं तो उन्हें इन पक्षियों की चहलकदमी बेहद भाती है। बता दें कि पहले ये गर्मी के मौसम में आते थे, लेकिन अब बारह माह ही इनकी उड़ान देखी जा रही है। प्रवासी व देशी पक्षियों की संख्या भी यहां लगातार बढ़ रही है। नर्मदा नदी पर अध्ययन कर रहे पर्यावरण विद् बताते हैं कि होशंगाबाद जिले की सीमा में बनखेड़ी -उमरधा से लेकर सिवनीमालवा के पापनगांव तक की नर्मदा तलहटी में मिश्र का गिद्ध, सारस क्रेन यानी टुफ्टेड डक, रिवर टर्न यानी स्टिरना ओरीटीना, रिवर लॉपिंग आदि बेहद सुंदर व आकर्षक पक्षी दिखाई देते हैं। इनका रहवास का कारण नर्मदा के किनारों पर इन्हें इनकी पसंद का भोजन, पेड़पौधे, जलराशि, अनुकूल मौसम, जलवायु सभी चीजें आसानी से उपलब्ध है।