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यूपी और राजस्थान को भी भाया गाडरवारा की तुवर दाल का स्वाद

किसानों ने सोयाबीन से बनाई दूरी, तीस से बढकऱ 43 हजार हेक्टेयर हुआ अरहर का रकबा

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यूपी और राजस्थान को भी भाया गाडरवारा की तुवर दाल का स्वाद

यूपी और राजस्थान को भी भाया गाडरवारा की तुवर दाल का स्वाद

नरसिंहपुर. दो दशक पूर्व तक जिले को सोयाबीन का कटोरा कहा जाता था। यहां हर दूसरा किसान सोयाबीन की नकदी फसल लेता था। लेकिन बदलते फसल चक्र के चलते किसानों ने सोयाबीन से दूरी बना ली और अरहर की फसल लेने लगे। परिणामस्वरूप मौजूदा समय में गाडरवारा क्षेत्र की प्रसिद्ध अरहर दाल का उत्पादन बढऩेके साथ ही अब इसकी आपूर्ति मप्र के अलावा यूपी और राजस्थान तक की जाने लगी है। खरीफ सीजन में ली जाने वाली यह फसल किसानों की समृद्धि बढ़ा रही है।
जानकारी के अनुसार पिछले साल हुए बंपर उत्पादन की बदौलत जिले की करीब 25 हजार मीट्रिक टन तुवर दाल यूपी और राजस्थान भेजी गई है। यहां बीते साल में अरहर का रकबा लगभग 30 हजार हेक्टेयर में रहा और उत्पादन लगभग 50 हजार मीट्रिक टन रहा है। वहीं इस साल के खरीफ सीजन में अरहर का रकबा बढकऱ 43 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया है। लिहाजा आगामी सालों में अरहर के रकबे और उत्पादन में बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद की जा रही है।
गांव-गांव में प्रसंस्करण इकाइयां लगाने की तैयारी

जिले में अरहर का प्रसंस्करण गाडरवारा क्षेत्र में सर्वाधिक होता है। सिर्फ गाडरवारा में ही करीब एक दर्जन से अधिक दाल मिलें हैं जो अरहर को प्रसंस्कृत करते हुए दाल तैयार करती हंै। इसके अलावा कृषि विभाग की ओर से गांव स्तर पर भी छोटी-छोटी प्रसंस्करण इकाइयों स्थापित किए जाने की तैयारी की जा रही है। इससे अरहर की दाल किसानों के घरों पर ही तैयार होने लगेगी। जानकारी के अनुसार कृषि विभाग की ओर लगभग एक दर्जन छोटी इकाईयों की स्थापना के प्रस्ताव तैयार कर स्वीकृति के लिए शासन को भेजे गए हैं। इन छोटी छोटी इकाइयों को ग्राम स्तर पर स्थापित कराया जाएगा। जिससे किसान अपनी अरहर का प्रसंस्करण गांव में ही करा सकेंगे। यह बिना पॉलिश की हुई प्राकृतिक अरहर दाल होगी।
तुवर दाल की एक दर्जन छोटी इकाइयों के प्रस्ताव स्वीकृति के लिए शासन को भेजे हैं। इन छोटी छोटी इकाइयों को ग्राम स्तर पर स्थापित कराया जाएगा। जिससे तुवर का प्रसंस्करण बढ़ेगा।
राजेश त्रिपाठी, उप संचालक कृषि

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