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बस नहीं तो बेबस जिंदगी, सुविधा की आस में गुजर रहीं पीढिय़ां,स्कूल-कॉलेज पहुंचने हर दिन नया संघर्ष

बसों की सुविधा न होने से सबकी जिंदगी बेबस बनी है। कई बुजुर्ग ऐसे हैं जिनकी पीढिय़ां इसी इंतजार में गुजर रहीं हैं

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गांव-कस्बों में पक्की सडक़ें तो बन गई हैं लेकिन बसों की सुविधा न होने से सबकी जिंदगी बेबस बनी है।

बसें न चलने से सूनी पड़ी देवनगर-केरवानी सडक़

bus service from their village नरसिंहपुर. घर-गांव से बाहर जाने मन में हर दिन यही आशंका कि पता नहीं कोई साधन मिलेगा या नहीं, समय से पहुंचेंगे या देरी होगी, चले जाएंगे तो लौटेंगे कैसे, कहीं कोई अप्रिय स्थिति तो नहीं बनेगी। आशंका और पीड़ा का यह दर्द जिले के पचासों गांवों के वाशिंदे दशकों से सह रहे हैं क्योंकि इनके गांव-कस्बों में पक्की सडक़ें तो बन गई हैं लेकिन बसों की सुविधा न होने से सबकी जिंदगी बेबस बनी है। कई बुजुर्ग ऐसे हैं जिनकी पीढिय़ां इसी इंतजार में गुजर रहीं हैं कि कभी तो गांव से शहर जाने बस की सुविधा मिलेगी, बच्चे बिना किसी डर-झिझक के स्कूल-कॉलेज आ-जा सकेंगे।
जिले में यात्री बसों का आवागमन सीमित और फायदे वाले रूटों पर तो काफी है। लेकिन जिले में बड़ी ग्रामीण आबादी को आवागमन के लिए बसों की सीधी और सुविधाजनक बस सेवा नहीं मिल पा रही है।
जिला मुख्यालय से उमरिया चिनकी, देवनगर होते हुए केरपानी से भोपाल-जबलपुर हाइवे को जोडऩे वाली सडक़ है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस रूट पर बस सेवा नहीं है, ग्रामीणों का आवागमन ऑटो, मैजिक और अन्य निजी वाहनों पर निर्भर है। जिसमें किराया मनमाना होता है लेकिन समय तय नहीं कि कब पहुंचगे और कब साधन मिलेगा। ग्रामीण कहते हैं कि एक बस तो यहां से चलती है लेकिन वह नियमित नहीं रहती, कभी चलती है तो कभी नहीं।
बच्चों की शिक्षा पर असर, सफर असुरक्षित
जिले की तेंदूखेड़ा तहसील मुख्यालय से मर्रावन, ढिलवार, महुआखेड़ा, खकरैड़ी, इमलिया जैसे आदिवासी गांवों के लिए कोई नियमित बस सेवा नहीं है। ग्रामीणों को 10 से 15 किलोमीटर का सफर मैजिक, ट्रैक्टर, बाइक, साइकिल या पैदल तय करना पड़ता है। इन गांवों तक पक्की सडक़ें बन चुकी हैं। ग्रामीण बताते हैं कि ठंड और गर्मी में किसी तरह आना-जाना हो जाता है, लेकिन बारिश में भीगते हुए सफर करना पड़ता है। बस सुविधा की कमी से बच्चों की शिक्षा पर असर पड़ रहा है। खासकर लड़कियां नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पातीं। कॉलेज जाने वाले युवाओं को भी समय पर पहुंचने में कठिनाई होती है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में देरी होती है, जिससे कई बार स्थिति गंभीर हो जाती है। महिलाओं और छात्राओं का सफर असुरक्षित बना रहता है। कुछ ऐसी ही स्थिति सर्रा बंधी और बिल्थारी गांवों की भी है, जहां की आबादी को तेंदूखेड़ा-डोभी तक करीब 10 किलोमीटर पैदल या अपने साधनों से जाना पड़ता है,
ऑटो-मैजिक ही हर दिन सहारा
गाडरवारा तहसील में ग्राम बारहबड़ा, सीरेगांव, भूतखेड़ा, बरेली, गोटीटोरिया जैसे दर्जनों गांवों की आबादी भी परिवहन सेवाओं से वंचित है। इन गांवों से गाडरवारा तक लगभग 20 किलोमीटर का सफर ऑटो और मैजिक के भरोसे होता है। लोगों को मनमाना किराया देना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि सडक़ें बस संचालन योग्य हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी।
बस पकडऩे पैदल जाना मजबूरी
गोटेगांव तहसील में भी कई गांव बस सुविधा से वंचित हैं। जैसे मुरदई के लोगों को 5 किलोमीटर पैदल चलकर गोटेगांव पहुंचना पड़ता है। नौनी से गोटेगांव की दूरी करीब 10 किलोमीटर है, जहां रिमझा चौराहा तक पैदल या अपने साधनों से जाना पड़ता है। देवनगर पुराना के लोगों को करीब 7 किलोमीटर और सालीबाड़ा के लोगों को लगभग 10 किलोमीटर का सफर इस उम्मीद में करना पड़ता है कि शायद कोई वाहन मिल जाए जो उन्हें अपने गंतव्य या जहां से बस मिलेगी वहां तक पहुंचा दे।
वर्जन
जिले के ग्रामीण रूटों पर बसों की कमी तो है, कई रूटों की लंबाई कम है। इसलिए भी बसों के संचालन में ऑपरेटर रूचि नहीं दिखाते, अभी ऐसे रूटों का सर्वे नहीं हुआ है।
रवि बरेलिया, जिला परिवहन अधिकारी नरसिंहपुर