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2029 चुनाव से पहले महिला आरक्षण पर बड़ा फॉर्मूला, सीटें बढ़ाकर लागू हो सकता है 33 प्रतिशत महिला कोटा

2029 चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करने के लिए लोकसभा सीटें 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की योजना बन रही है। इसका मकसद महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना और मौजूदा राजनीतिक संतुलन बनाए रखना है।

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भारत

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Himadri Joshi

Apr 08, 2026

woman voter

महिला वोटर्स (फोटो- एआई जनरेटेड)

देश में महिला आरक्षण को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है और इसे नारी सशक्तीकरण का बड़ा कदम माना जा रहा है। अब इस मुद्दे पर नई रणनीति सामने आती दिख रही है, जिसमें राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश भी शामिल है। सूत्रों के अनुसार, सरकार 2029 के आम चुनाव से ही लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में है, जिसके लिए सीटों की संख्या बढ़ाने का विकल्प गंभीरता से विचाराधीन है।

मौजूदा सीटों में नहीं होगी कटौती

महिला आरक्षण लागू करने के लिए मौजूदा सीटों में कटौती के बजाय उन्हें बढ़ाने का विचार एक तरह के पॉलिटिकल सेफ्टी नेट के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा, बल्कि मौजूदा नेताओं और दलों के हित भी संतुलित रह सकेंगे। यही वजह है कि इस योजना को केवल सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

आरक्षण के बाद लगभग 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित

सूत्रों के मुताबिक, वर्तमान में लोकसभा की कुल 543 सीटें हैं। यदि सीधे 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाता है, तो लगभग 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करनी होंगी। इससे कई मौजूदा सांसदों की सीटें प्रभावित होंगी और राजनीतिक असंतोष बढ़ सकता है। इसी चुनौती से बचने के लिए सीटों की कुल संख्या को लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रस्ताव सामने आया है।

लोकसभा की सीटें बढ़ सकती है

इस फॉर्मूले के तहत लोकसभा की सीटें बढ़कर करीब 800 से 816 तक पहुंच सकती हैं। इस स्थिति में लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं। इससे नए प्रतिनिधित्व के साथ पुराने नेताओं की स्थिति भी काफी हद तक सुरक्षित रह सकती है, जो इस रणनीति का मुख्य आधार माना जा रहा है।

वर्तमान में 85 प्रतिशत सांसद पुरुष

इस प्रस्ताव के पीछे सबसे बड़ा कारण मौजूदा राजनीतिक ढांचे को सुरक्षित रखना है। वर्तमान संसद में लगभग 85 प्रतिशत सांसद पुरुष हैं। यदि बिना सीट बढ़ाए आरक्षण लागू किया गया, तो बड़ी संख्या में नेताओं को अपनी सीट गंवानी पड़ सकती है। इससे राजनीतिक असंतोष और दलों के भीतर अस्थिरता पैदा हो सकती है। ऐसे में सीटों का विस्तार एक संतुलित समाधान के रूप में देखा जा रहा है। इससे महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलेगा और मौजूदा नेताओं की राजनीतिक जमीन भी पूरी तरह खत्म नहीं होगी। यह कदम सत्तारूढ़ दलों के साथ-साथ विपक्ष के लिए भी स्वीकार्य विकल्प बन सकता है।

क्षेत्रीय संतुलन और परिसीमन फैक्टर

इस योजना का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। लंबे समय से दक्षिणी राज्यों को यह आशंका रही है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उनकी सीटों का अनुपात घट सकता है। ऐसे में सीटों को सीधे 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का विकल्प इस असंतुलन को टालने का एक तरीका माना जा रहा है। इसके अलावा, सरकार 2027 की नई जनगणना का इंतजार किए बिना 2011 के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। इससे प्रक्रिया में तेजी आएगी और राजनीतिक विरोध को सीमित किया जा सकेगा। कुल मिलाकर यह रणनीति सामाजिक प्रतिनिधित्व, राजनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय हितों को एक साथ साधने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।