आरटीई यानि शिक्षा का अधिकार, गरीबों के बच्चों को उच्च स्तरीय शिक्षा देने के उद्देश्य से केंद्र ने प्रदेश सरकारों के माध्यम से इस अधिनियम को लागू किया था। लेकिन इस अधिकार पर प्राइवेट स्कूल बट्टा लगाते दिखाई दे रहे हैं। क्योंकि सरकारी आदेश होने के बाद भी वे गरीबों के बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं दे रहे हैं।
आरटीई कानून से हो रहा खिलवाड़
सपने तो सपने होते हैं फिर चाहे वो किसी की भी आंखों से क्यो न देखे जायें। लेकिन गरीब की बात आते ही हालात बदल से जाते हैं तभी तो गरीब परिवारों से ताल्लुक रखने वालें इन बच्चों की आंखों मे जो सपने पल रहे हैं। उन्हें देखना शुरू करते ही उनके टूटने की नौबत आ चुकी है। गरीब परिवारों के उन बच्चों की जिनको उच्च स्तरीय शिक्षा देने के लिए केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार नियम यानि राइट टू एजूकेशन (आरटीई) बनाया। जिसे लागू करने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकारों पर हैं, लेकिन बिड़ंबना देखिये सरकारी आदेश होने के बाद भी ये बच्चे अब तक स्कूलों मे प्रवेश नहीं पा पाये हैं। रोजाना स्कूल के दरवाजे तक जाकर बिना पढ़े ही बापस लौट आते हैं क्योंकि अब तक इन्हें प्रवेश नहीं दिया गया।
लौटा दिया जाता है रोज स्कूल के गेट से
रोजाना दिहाड़ी मजदूरी कर घर चलाने वाले प्रेम सिंह, रवि, राजू, संजय, सोनू ने बच्चों का पहली कक्षा में तो रवि, बाबू, संजीव, राजीव, रवि, राजेश, कर्मबाबू, नरेश और संजय के बच्चों का नर्सरी में प्रवेश कराने के लिए शिक्षा का अधिकार नियम के तहत शिक्षा विभाग में आवेदन किया था। काफी जोर मशक्कत के बाद बेसिक शिक्षा विभाग ने इनका प्रवेश लोहामंड़ी के होली पब्लिक स्कूल में कराने के आदेश दे दिये, लेकिन 12 अप्रैल से लेकर अब तक वे रोजाना अपने बच्चों को लेकर स्कूल जाते हैं लेकिन स्कूल प्रशासन उनसे नहीं मिलता बल्कि गेट से ही कल आने का आश्वासन देकर लौटा दिया जाता है।
इन बच्चों के अभिभावकों को जब राइट टू एजूकेशन के बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने भी सपने देखने शुरू कर दिये कि थोड़ी कोशिश करके यदि आदेश
मिल गया तो बच्चे भी अच्छे स्कूल में पढ़ लेंगे, लेकिन जिस तरह से बच्चों को रोजाना स्कूल के गेट से ही वापस लौटा दिया जाता है। उससे उनका सपना टूटता सा दिखने लगा है और वे कहते दिख रहे हैं कि इससे तो ये सपना दिखाया ही न होता।
केंद्र सरकार का है निर्देश
केंद्र सरकार के निर्देश पर प्रदेश सरकारों ने आदेश जारी कर सभी निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब परिवारों के बच्चों को प्रवेश देने के आदेश दिये थे। जिनकी फीस से लेकर किताबों और ड्रेस तक का खर्च उन्हे सरकार देगी। लेकिन जिस तरह से नियमों को धता बताते हुए आदेश होने के बाद भी निजी स्कूल मनमानी कर रहे हैं। उससे सबाल उठता है कि बच्चों के पढ़ने और बढ़ने का सपना कैसे पूरा हो पायेगा।
क्या कहना है खंड शिक्षा अधिकारी का
खंड शिक्षा अधिकारी नीलम सिंह ने बताया कि ऐसा मामला संज्ञान में आया है। इसके बारे में अधिकारियों को अवगत कराकर कार्रवाई करायी जायेगी।