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सोते हुए मनमोहन सिंह को आया फोन कॉल, वित्त मंत्री बनकर बदल दी भारत की आर्थिक तकदीर

Manmohan Singh Death Anniversary: आज मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि है। इस मौके पर उनके वित्त मंत्री बनने का किस्सा जानिए। कैसे उन्होंने बदल थी भारत की आर्थिक तकदीर...

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मनमोहन सिंह पूर्व पीएम (फोटो-X ani)

Manmohan Singh Death Anniversary: आज देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (कार्यकाल- 2004-2014) की पुण्यतिथि है। इस मौके पर उन्हें देश के दिग्गज हस्तियों ने श्रद्धांजलि दी। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, "डॉ. मनमोहन सिंह समानता में विश्वास रखने वाले, दृढ़ निश्चयी, साहसी और गरिमापूर्ण व्यक्तित्व की मिसाल थे, जो सच्चे अर्थों में देश की प्रगति के लिए समर्पित रहे। उनकी सादगी, ईमानदारी और देश के प्रति उनका समर्पण सदैव हम सबको प्रेरणा देता रहेगा।"

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 'एक्स' पर लिखा, "उनकी पहली पुण्यतिथि पर हम पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के भारत के राष्ट्र निर्माण में दिए गए अपार योगदान को गहरे सम्मान के साथ याद करते हैं। एक परिवर्तनकारी नेता के तौर पर उन्होंने देश के आर्थिक रास्ते को नया आकार दिया और आर्थिक सुधारों के ज़रिए लाखों लोगों के लिए अवसर बढ़ाए और लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला।"

भारत को दिवालिया होने से बचाया

मनमोहन सिंह को एक टेक्नोक्रेट और सफल अर्थशास्त्री के रूप में जाना जाता है। उन्होंने वित्तमंत्री रहते हुए भारत की आर्थिक तकदीर को बदलकर रख दिया। दरअसल, 1991 में भारत दिवालिया होने के कगार पर खड़ा था। विदेशी मुद्रा भंडार में महज 2,500-4,000 करोड़ रुपए रह गए थे, जो दो हफ्तों के आयात के लिए भी पर्याप्त नहीं थे। खाड़ी युद्ध के चलते देश में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं। भारत का मजबूत साझेदार सोवियत संघ का सूर्य अस्त हो रहा था।

RBI को रखना पड़ा था 47 टन सोना गिरवी

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को अपना 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था। लाइसेंस राज, बंद अर्थव्यवस्था और नियंत्रणों ने विकास के पैरों में जंजीरे बांध दी थी। महंगाई दहाई अंक में थी और भुगतान संतुलन भी पूरी तरह से बिगड़ चुका था। आर्थिक अस्थिरता के साथ ही भारतीय राजनीति भी हिचकोले खा रही थी। पूर्व पीएम राजीव गांधी की हत्या के बाद 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन बहुमत से दूर थी।

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने अनुभवी और विद्वान पी.वी. नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना, जो उस समय राजनीति से संन्यास लेने की सोच रहे थे। 21 जून 1991 को पी.वी. नरसिम्हा राव ने भारत के 9वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। शपथ लेने के बाद राव के सामने सबसे चुनौती भारत की माली हालत को ठीक करने की थी।

नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह को बनाया वित्त मंत्री

ऐसे समय में पीएम नरसिम्हा राव को वित्त मंत्रालय के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ की जरूरत थी। पहले आई.जी. पटेल का नाम आया, लेकिन उन्होंने वित्तमंत्री बनने से साफ मना कर दिया। फिर नरसिम्हा राव के करीबी अलेक्जेंडर ने मनमोहन सिंह का नाम सुझाया।

पूर्व आरबीआई गवर्नर, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे मनमोहन सिंह, जिनकी ईमानदारी और विशेषज्ञता बेजोड़ थी। वह उस समय UGC के अध्यक्ष थे और नीदरलैंड से एक सम्मेलन में हिस्सा लेकर लौटे थे। दिल्ली में स्थित अपने घर में थकान से चूर होकर गहरी नींद में सो रहे थे। तभी देर रात उनके घर का फोन बजा। यह फोन मनमोहन सिंह के दामाद विजय तनखा ने उठाया। फोन के दूसरी तरफ पीवी नरसिम्हा राव के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीसी अलेक्जेंडर थे।

नींद से जगाए गए थे मनमोहन सिंह

अलेक्जेंडर ने विजय तनखा से गुजारिश की वह मनमोहन सिंह को नींद से जगाए। विजय तनखा द्वारा मनमहोन सिंह को जगाने के बाद अलेक्जेंडर ने उनसे मुलाकात की। अलेक्जेंडर ने मनमहोन सिंह से कहा कि नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव उन्हें वित्त मंत्री बनाना चाहते हैं। जून 1991 को राष्ट्रपति भवन में मनमोहन सिंह का शपथ ग्रहण हुआ।

मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह की किताब 'स्ट्रिक्टली पर्सनल' में लिखा है कि शपथ के समय सभी हैरान थे। पोर्टफोलियो बाद में मिला, लेकिन राव ने मनमोहन सिंह को तुरंत बता दिया था कि आप वित्त मंत्री होंगे। मनमोहन सिंह ने चुनौती स्वीकार की। 24 जुलाई 1991 को संसद में अपना पहला बजट पेश करते हुए उन्होंने अपने पहले बजट भाषण में कहा, "विक्टर ह्यूगो ने लिखा है कि दुनिया की कोई ताकत उस विचार को रोक नहीं सकती जिसका समय आ गया है।"

LPG की रखी नींव, लाइसेंस राज खत्म

उन्होंने भारत के बाजार को दुनिया के लिए खोल दिया। बजट में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नींव पड़ी। जिसे आम भाषा में LPG कहा गया। लाइसेंस राज खत्म हुआ और विदेशी निवेश के दरवाजे खुल गए। सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार समाप्त हुआ। रुपए का अवमूल्यन किया गया। इससे निर्यात को बढ़ावा मिला।

मनमोहन सिंह के कदमों का हुआ विरोध

हालांकि, नरसिम्हा राव की अल्पमत की सरकार के लिए यह सब आसान नहीं था। पार्टी के भीतर ही मनमोहन सिंह के कदमों का जबरदस्त विरोध हुआ। कई सांसदों ने इसे पूंजीवादी करार दिया। राव ने पार्टी बैठकें करवाईं, जहां मनमोहन को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। बॉम्बे क्लब के उद्योगपतियों ने विदेशी प्रतिस्पर्धा का डर जताया, लेकिन मनमोहन सिंह ने अपने कदमों को वापस नहीं लिया। इसका सकारात्मक असर जल्द ही दिखने लगा। भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर आई। विदेशी निवेश बढ़ा, विकास दर ऊंची हुई, और भारत बंद अर्थव्यवस्था से वैश्विक खिलाड़ी बना।

आज, जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसकी जड़ें 1991 के उन सुधारों में हैं। वो रात का फोन कॉल न केवल मनमोहन सिंह की जिंदगी बदला, बल्कि करोड़ों भारतीयों की तकदीर संवारी।