
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा है कि माता-पिता, पति-पत्नी और बच्चों के अंतिम संस्कार में शामिल होना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार के दायरे में आता है। जेल में बंद विचाराधीन कैदी को भी यह मौलिक अधिकार है। अदालत ने एनडीपीएस मामले के आरोपी की याचिका पर यह टिप्पणी करते हुए उसे पिता के अंतिम संस्कार और 16वें दिन के कार्यक्रम में शामिल होने की इजाजत दे दी।
एक कैदी की याचिका पर रविवार को अवकाश के दिन सुनवाई करते हुए जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने यह आदेश दिया। अदालत ने कैदी को जमानत या अंतरिम जमानत देने पर कड़ी आपत्ति जताई, लेकिन कहा कि अंतिम संस्कार में शामिल होने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25 का हिस्सा है। अनुच्छेद 25 स्वतंत्र व्यक्तियों और कैदियों के बीच कोई अंतर नहीं करता।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता एक हिंदू है। एक पुत्र के रूप में उसे मुखाग्नि और पिंडदान जैसे धार्मिक दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता है। ये धर्म के मामले हैं और अदालत को इसका उचित सम्मान करना चाहिए। कोर्ट ने केंद्रीय कारागार, मदुरै के अधीक्षक को याचिकाकर्ता को अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति देने के लिए उचित व्यवस्था करने का निर्देश दिया।
Updated on:
13 Feb 2024 05:57 am
Published on:
13 Feb 2024 05:55 am
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