
PM Narendra Modi on Ram Temple donation controversy : सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बीच पीएम मोदी की चुप्पी पर कांग्रेस के सवाल (फोटो सोर्स: facebook@Narendra Modi)
Ram Mandir Donation Controversy: अयोध्या करोड़ों रामभक्तों की अगाध आस्था के केंद्र अयोध्या धाम से जुड़ा एक ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने देश की सियासत में भूचाल ला दिया है। अयोध्या में प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए देश-विदेश से मिले चंदे में कथित वित्तीय अनियमितताओं और धोखाधड़ी को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' (कतई बर्दाश्त नहीं) का दंभ भरने वाले प्रधानमंत्री इस बेहद संवेदनशील और आस्था से जुड़े मुद्दे पर रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए हैं।
कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक बेहद आक्रामक पोस्ट साझा कर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया। उन्होंने इसे देश की जनता और भक्तों के साथ विश्वासघात करार दिया।
आस्था से खिलवाड़ और चंदे की चोरी! आखिर अयोध्या धाम में प्रभु श्री राम के मंदिर निर्माण के चंदे में हुई इस सुनियोजित हेराफेरी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रहस्यमयी चुप्पी क्या दर्शाती है? क्या यह जनता के भरोसे के साथ धोखा नहीं है? भ्रष्टाचार पर 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा' का नारा देने वाले प्रधानमंत्री पिछले एक महीने से इस गंभीर धांधली पर मौन क्यों हैं? देश उनसे जवाब मांग रहा है।
कांग्रेस इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने के मूड में नहीं है। जयराम रमेश के मुताबिक, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने पिछले चार दिनों के भीतर देश के अलग-अलग शहरों में 50 से अधिक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर सीधे सरकार को घेरा है और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने की मांग की है।
सियासी घमासान के बीच इस मामले पर कानूनी कार्रवाई भी तेज हो गई है। अयोध्या की स्थानीय अदालत ने सोमवार को चंदा गबन मामले के सभी आठ आरोपियों की न्यायिक हिरासत और 14 दिनों के लिए बढ़ा दी है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेशी: सुरक्षा और संवेदनशीलता को देखते हुए सभी आठ आरोपियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट के समक्ष पेश किया गया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को होगी।
अहम सबूत दाखिल: मामले की जांच कर रहे विवेचक (IO) आशुतोष तिवारी ने एंटी-करप्शन कोर्ट में रिमांड के दौरान आरोपियों के पास से बरामद किए गए महत्वपूर्ण दस्तावेज और साक्ष्य पेश किए हैं, जिससे आरोपियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने राम मंदिर चंदे में कथित गबन और हेराफेरी की स्वतंत्र व कोर्ट-निगरानी में जांच (Court-Monitored Probe) की मांग वाली याचिकाओं पर संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए: केंद्र सरकार
, उत्तर प्रदेश सरकार, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को नोटिस जारी कर इस पूरे मामले पर उनका जवाब तलब किया है। कोर्ट के इस रुख के बाद अब इस मामले की जांच के दायरे और पारदर्शिता को लेकर दबाव बेहद बढ़ गया है।
यह पहली बार नहीं है जब राम मंदिर के पैसों या जमीन को लेकर इस तरह के आरोप लगे हैं। इससे पहले भी ट्रस्ट और मंदिर निर्माण की प्रक्रियाओं पर सवाल उठते रहे हैं:
2021 का जमीन खरीद विवाद: साल 2021 में भी विपक्षी दलों (विशेषकर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस) ने आरोप लगाया था कि अयोध्या में मंदिर के पास की एक जमीन, जिसे एक शख्स ने ₹2 करोड़ में खरीदा था, उसे महज कुछ ही मिनटों बाद राम मंदिर ट्रस्ट को ₹18.5 करोड़ में बेच दिया गया। हालांकि, ट्रस्ट ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया था।
करोड़ों भक्तों की भावनाएं दांव पर: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पास अब तक देश-विदेश से ₹3,500 करोड़ से अधिक का दान आ चुका है। इसमें ऑनलाइन ट्रांसफर, चेक, सोने-चांदी के आभूषण और कैश शामिल हैं। इतनी बड़ी धनराशि के प्रबंधन में जरा सी भी चूक या धोखाधड़ी सीधे तौर पर करोड़ों भक्तों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती है।
पारदर्शिता की उठ रही मांग: विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के घोटालों और फर्जी रसीदों के जरिए होने वाली धोखाधड़ी को रोकने के लिए ट्रस्ट को अपनी ऑडिट रिपोर्ट और दानकर्ताओं की सूची को पूरी तरह सार्वजनिक और डिजिटल रूप से पारदर्शी बनाना चाहिए, ताकि कोई भी असामाजिक तत्व धर्म के नाम पर ठगी न कर सके।
Updated on:
14 Jul 2026 09:01 am
Published on:
14 Jul 2026 09:01 am
