
चुनाव से पहले बांग्लादेश में वर्तमान स्थिति चिंताजनक: अब तक 11 की मौत, 616 घायल (इमेज सोर्स: ANI)
Hindu Minority: बांग्लादेश में होने वाले आम चुनावों (Bangladesh General Election 2026) ने न केवल वहां की घरेलू राजनीति में भूचाल ला दिया है, बल्कि भारत के लिए भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। ढाका की राजनीति में विकास और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे पीछे छूट गए हैं। अब वहां चुनाव जीतने के लिए भारत को कोसना (Anti India Sentiment) और अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाना (Hindu Minority Crisis) सबसे आसान 'शॉर्टकट'बन गया है।बांग्लादेश की राजनीति को करीब से समझने वाले जानकारों का कहना है कि वहां के कट्टरपंथी गुटों ने 'भारत विरोधी' लहर को एक मजबूत वोट बैंक में बदल दिया है। वहां की विपक्षी पार्टियां और चरमपंथी संगठन जनता के बीच यह भ्रम फैलाने में लगे हैं कि मौजूदा सरकार भारत के इशारों पर काम करती है।
इस "एंटी-इंडिया" कैम्पेन का मकसद सीधा है-राष्ट्रवाद की आड़ में कट्टरपंथ को बढ़ावा देना। सोशल मीडिया पर 'इंडिया आउट' जैसे अभियानों को जानबूझ कर हवा दी जा रही है, ताकि भारत के प्रति नफरत भरकर वोट बटोरे जा सकें।
बांग्लादेश में जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, वहां रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की सांसें अटक जाती हैं। इनसाइड स्टोरी यह है कि हिंदुओं को डरा कर एक विशेष वर्ग का वोट हासिल करने की रणनीति अपनाई जा रही है:
सॉफ्ट टारगेट: चुनाव के दौरान ध्रुवीकरण (Polarization) करने के लिए हिंदू मंदिरों और बस्तियों को निशाना बनाना वहां के उपद्रवियों के लिए आसान है।
जमीन पर कब्जा: सियासी रसूख का इस्तेमाल कर अल्पसंख्यकों की जमीन हड़पने के मामले चुनावी साल में बढ़ जाते हैं।
दहशत का माहौल: ईशनिंदा (Blasphemy) के झूठे आरोपों के जरिए भीड़ को उकसाया जाता है, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ती है और इसका फायदा कट्टरपंथी पार्टियां उठाती हैं।
बांग्लादेश के चुनावों की तपिश भारत के पश्चिम बंगाल तक महसूस की जा रही है। 2026 का साल बंगाल की राजनीति के लिए भी बेहद अहम है। जानकारों का मानना है कि अगर पड़ोसी मुल्क में कट्टरपंथी ताकते मजबूत होती हैं, तो इसका सीधा असर सीमा पार बंगाल पर पड़ेगा।
घुसपैठ का डर: सीमा पर अस्थिरता से घुसपैठ की कोशिशें बढ़ सकती हैं।
भावनात्मक असर: बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार की खबरें पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को भी प्रभावित करेंगी। इससे बंगाल में भी राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में विदेशी ताकतों का भी हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान और चीन परोक्ष रूप से उन ताकतों को समर्थन दे रहे हैं जो बांग्लादेश को भारत से दूर करना चाहती हैं। उनका मकसद दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को कम करना है।
बांग्लादेश का यह चुनाव अब सिर्फ सरकार बदलने का नहीं, बल्कि वहां की विचारधारा तय करने का चुनाव बन गया है। अगर नफरत की राजनीति जीतती है, तो यह भारत की सुरक्षा और दोनों देशों के रिश्तों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। भारत को न केवल कूटनीतिक स्तर पर बल्कि सीमा सुरक्षा के लिहाज से भी अब 'वेट एंड वॉच' की नीति छोड़कर सतर्क रहना होगा।
यह स्थिति भारत के लिए बेहद संवेदनशील है। एक पड़ोसी देश में भारत विरोधी भावनाओं का इस कदर मुख्यधारा की राजनीति में आ जाना चिंताजनक है। यह केवल कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि कट्टरपंथ के गहराते साये का संकेत है। भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाना चाहिए, साथ ही सीमा पर चौकसी और कड़ी करनी होगी। लोकतंत्र के नाम पर नफरत की यह खेती पूरे दक्षिण एशिया की शांति भंग कर सकती है।
बांग्लादेश में चल रही सियासी उथल-पुथल और कट्टरपंथ का सीधा असर पश्चिम बंगाल की सामाजिक और राजनीतिक फिजा पर पड़ना तय है। चूंकि 2026 में बंगाल में भी विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में पड़ोसी मुल्क में 'भारत विरोधी' और 'हिंदू विरोधी' लहर यहां के मतदाताओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करेगी। सीमा पार अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की खबरें बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण (Polarization) और तेज कर सकती हैं, जिसका सीधा असर वोटिंग पैटर्न पर दिखेगा। इसके अलावा, वहां की अस्थिरता से सीमा पर घुसपैठ का खतरा बढ़ेगा, जिससे डेमोग्राफी और कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। यह स्थिति बंगाल चुनाव में 'सुरक्षा' और 'राष्ट्रवाद' को मुख्य मुद्दा बना देगी, जिससे राज्य के समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
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राजनीतिक शोर-शराबे के बीच आर्थिक पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश के लिए भारत आवश्यक वस्तुओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। अगर 'भारत विरोध' का नारा सिर्फ चुनावी जुमला न रहकर हकीकत में बदलता है, तो इसका सबसे बुरा असर बांग्लादेश की आम जनता की जेब पर पड़ेगा। प्याज, चावल और अन्य जरूरी चीजों की सप्लाई चेन टूटने से वहां महंगाई बेकाबू हो सकती है, जो किसी भी नई सरकार के लिए सिरदर्द साबित होगी।
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Updated on:
11 Feb 2026 12:32 pm
Published on:
11 Feb 2026 12:31 pm
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