3 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Bihar Chunav: खून बिखरता था हर इलेक्शन में..अब सुकून के फूल बिखरे हैं सडक़ों पर

खुफिया तंत्र को अभी भी भीमनांद की पहाडिय़ों में खदेड़े गए नक्सलियों के वहां छिपे होने की आशंका है, जो संभवतया बिहार में इनका अंतिम गिरोह है।

3 min read
Google source verification
बिहार चुनाव

bihar elections (Photo-Patrika)

कभी माओवाद और नक्सली गतिविधियों का गढ़ रहे जमुई जिले ने अब सुकून का नया दौर देखना शुरू किया है। विधानसभा चुनाव 2005 में यहां पुलिस अधीक्षक की हत्या और 2010 में नरसंहार तथा लूट की घटनाओं ने इस इलाके का नाम दहशत के प्रतीक के रूप में दर्ज कर दिया था। तब यहां कदम रखने से पहले ‘सोलह हाथ का कलेजा’ चाहिए होता था।

खुफिया तंत्र के मुताबिक, भीमनांद की पहाड़ियों में कुछ नक्सली अब भी छिपे होने की आशंका है, लेकिन 2022–23 के आखिरी एनकाउंटर के बाद यह क्षेत्र लगभग नक्सलमुक्त घोषित हो चुका है। अब जमुई में न डर है, न दहशत। दबंगई, बाहुबल और राजनीतिक घरानों की प्रतिस्पर्धा ने यहां के चुनाव को दक्षिण बिहार का सबसे दिलचस्प मुकाबला बना दिया है।

जमुई जिले की चार सीटें—जमुई, सिकंदरा, झाझा और चकाई—बिहार विधानसभा की अंतिम चार सीटें हैं। इसके आगे झारखंड की सीमा शुरू होती है। आज का जमुई देखकर यकीन करना मुश्किल है कि दो साल पहले यहां गोलियां चली थीं। स्पोर्ट्स स्टेडियम में रात आठ बजे तक दूधिया रोशनी में दो सौ से अधिक बेटियां खेलती नजर आईं। बाजारों में सीआरपीएफ के जवान सतर्क हैं, पर लोग निश्चिंत होकर घूम रहे हैं। सड़कों पर अब बारूद नहीं, फूल बिखर रहे हैं।

श्रेयसी बनाम समसाद—दिलचस्प मुकाबला

जमुई सीट पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एनडीए प्रत्याशी श्रेयसी सिंह के समर्थन में सभा की। उनके सामने महागठबंधन (राजद) के शमशाद आलम मैदान में हैं, जबकि जनसुराज के अनिल साह और निर्दलीय अमरेन्द्र कुमार सिंह मुकाबले को और रोचक बना रहे हैं।

श्रेयसी, पूर्व रेल राज्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व सांसद पुतुल कुमारी की पुत्री हैं। पिछली बार उन्होंने करारी जीत दर्ज की थी। इस बार आरजेडी ने यादव-मुस्लिम समीकरण साधने के लिए समसाद पर दांव लगाया है। अर्जुन अवॉर्ड विजेता शूटर श्रेयसी को इस बार बहुकोणीय मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है।

नक्सल क्षेत्र से लोकतंत्र की दिशा में

जमुई से सटा इमामगंज विधानसभा क्षेत्र अब भी सबसे अधिक नक्सल प्रभावित माना जाता है। 403 बूथों में से 367 संवेदनशील हैं। गुरमाह, चुरमरा, जमुनाई राड़ और भीमनांद जैसे इलाकों में भारी सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है।

रोजगार और विकास की नई उम्मीद

नक्सलवाद भले चला गया हो, लेकिन बेरोजगारी अब भी डेरा जमाए है। झारखंड का कामकाजी रास्ता बंद होने से लोग स्थानीय रोजगार की राह देख रहे हैं। पहाड़ों, नदियों और जंगलों से घिरा यह इलाका प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है, पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं हैं। स्पोर्ट्स स्टेडियम में खेलते सूरजन कुमार कहते हैं, 'अगर युवाओं को खेल, सेना और सुरक्षा क्षेत्र में मौके मिलें, तो जमुई बहुत आगे जा सकता है।' मलईपुर गांव के राणा संजय सिंह का कहना है, 'तीर्थ स्थलों का विकास, बायपास, पुल और सिंचाई व्यवस्था सुधरे, तो यहां का चेहरा बदल जाएगा।' कटौना के संतोष कुमार सिंह और टिगारा के मुखर्जी यादव मानते हैं कि टक्कर दिलचस्प है, पर वोट अब भी जातीय आधार पर बंट रहा है। 'फैसला युवा करेंगे या परंपरा दोहराई जाएगी — यह देखने वाली बात होगी।'

अन्य सीटों पर मुकाबले

सिकंदरा: यहां जनसुराज प्रत्याशी सुभाषचंद्र बोस (लोजपा पासवान) का नाम चर्चा में है। मुख्य मुकाबला एनडीए के प्रफुल्ल मांझी और राजद के उदयनारायण चौधरी के बीच है। क्षेत्र में अपराध का ग्राफ अभी भी चिंता का विषय है।

झाझा: यहां राजद के जयप्रकाश नारायण, जदयू के दामोदर राव और जनसुराज के डॉ. एन.डी. मिश्रा में त्रिकोणीय संघर्ष है। बीड़ी मजदूरों की बीमारी और सड़कों की दुर्दशा प्रमुख मुद्दे हैं।

चकाई: मौजूदा विधायक और जदयू प्रत्याशी सुमित सिंह (पूर्व मंत्री नरेन्द्र सिंह के पुत्र, तीसरी पीढ़ी के नेता) के सामने सावित्री देवी और जनसुराज के राहुल कुमार मैदान में हैं। यहां महागठबंधन को कड़ा मुकाबला झेलना पड़ रहा है।