
Goods stuck in ports
ईरान-अमेरिका इज़रायल युद्ध (Iran-US Israel War) का असर भारतीय कारोबार पर दिखने लगा है। वैश्विक तेल व्यापार की जीवन रेखा होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के बाधित होने से देश का अरबों का माल बंदरगाहों और गोदामों में डंप हो गया है। कई कंटेनरों में फल, सब्जी जैसे खाद्य पदार्थ सड़ रहे हैं। गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के निर्यातक सबसे ज्यादा परेशान हैं। अनुमान है कि कृषि निर्यात पर ही 8-12 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। विशेषकर बासमती चावल (जो गल्फ देशों को 70% निर्यात होता है), केला, मसाले, फार्मा और जेम्स-ज्वैलरी के अलावा छोटे उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
उत्पादन लागत (तेल, गैस, फर्टिलाइजर) बढऩे से छोटे निर्यातक संकट में हैं। दूसरी ओर स्वेज नहर में हूती विद्रोहियों के डर से यूरोपीय देशों से आने वाले कुछ मालवाहक जहाजों को अफ्रीका के कैप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाकर आना पड़ रहा है, जिससे ट्रांज़िट समय 15 से 20 दिन तक बढ़ रहा है। शिपिंग रूट बाधित होने से फ्रेट रेट दोगुने हो गए और बीमा प्रीमियम भी बढ़ गया। इससे कई कारोबार सीधे प्रभावित हुए हैं। ऑर्डर कैंसिल हो रहे हैं और माल नहीं पहुंचने से मजदूर खाली बैठे हैं।
राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश में बाहरी राज्यों से आए श्रमिक लौट रहे हैं। दूसरी ओर जहाजों और खाड़ी देशों में फंसे लोग और उनके परिवार जल्द ही हालात सामान्य होने की आस लगाए बैठे हैं। हालांकि भारत सरकार के प्रयासों से सभी खाड़ी देशों में फंसे दो लाख से ज़्यादा लोगों को अब तक निकाला जा चुका है, वहाँ कामगार और अन्य व्यवसायों से जुड़े लोगों में अब भी चिंता है।
बूंदी-कोटा क्षेत्र की 35 चावल मिलों में संकट गहरा गया है। लगभग 3,75,000 क्विंटल बासमती चावल (कीमत करीब 300-350 करोड़ रुपए) बंदरगाहों और गोदामों में फंसा हुआ है। 10,000 श्रमिक (60% बिहार से) बेरोजगार बैठे हैं। माल नहीं जाने से बाड़मेर मंडी में जीरे के भाव 15-20 रुपए प्रति किलो गिरे, इसबगोल 10-15 रुपए सस्ता हुआ। नागौर आदि जिलों में ग्वार गम, जीरा और मसालों का निर्यात ठप पडऩे से किसान परेशान हैं। रासायनिक उत्पादों की आपूर्ति रुकने से भीलवाड़ा, पाली और बालोतरा में कई फैक्टरियां बंद होने की स्थिति में हैं। एक व्यापारी ने कहा कि निर्यात न होने से बाजार में मांग शून्य हो गई, अब भाव टूट रहे हैं।
राज्य में बुरहानपुर-बारवानी के केला निर्यातक रो रहे हैं। गल्फ देशों (सऊदी अरब, ओमान, दुबई, इराक) से अप्रैल-मई के लिए आने वाली डिमांड अभी तक शुरू नहीं हुई है। युद्ध लंबा चला तो 13 हज़ार मीट्रिक टन केले का निर्यात प्रभावित होगा। ऐसा रहा तो केले की कीमतें 900-1200 रुपए प्रति क्विंटल गिर सकती है। जिससे उत्पादकों और निर्यातकों को भारी नुकसान होगा। निर्यातक राजेन्द्र चौकसे ने कहा कि बाग तैयार थे, लेकिन मांग शुरू ही नहीं हुई। इसी तरह से मध्यप्रदेश के फार्मा क्षेत्र का भुगतान अटक गया है। कच्चे माल की कीमतें बढ़ीं और माल भाड़ा महंगा हो गया। नए ऑर्डर भी रुक गए। बासमती चावल निर्यातक विपिन शर्मा ने बताया कि 'कंटेनरों की कमी से हजारों टन माल बंदरगाहों पर जमा है। वैकल्पिक बाजार तलाश रहे हैं, लेकिन स्थिति खराब है।
युद्ध के कारण मोरबी का सिरेमिक उद्योग, जो गल्फ देशों में टाइल्स का बड़ा निर्यात करता है, बढ़ती लागत के कारण ऑर्डर में कमी और मार्जिन दबाव का सामना कर रहा है। केमिकल और पेट्रोकेमिकल सेक्टर में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल से उत्पादन महंगा हो गया है। टेक्सटाइल और गारमेंट निर्यातकों को भी गल्फ देशों से नए ऑर्डर मिलने में सुस्ती का सामना करना पड़ रहा है। मेहसाणा जिले के उंझा का जीरा बाजार, पहले से ही कमजोर मांग से जूझ रहा था, लेकिन अब वैश्विक अनिश्चितता ने इसमें और दबाव बढ़ा दिया है। निर्यातकों के सामने सबसे बड़ी समस्या भुगतान और नकदी प्रवाह की है। गल्फ देशों के खरीदार सतर्क हो गए हैं, जिससे भुगतान में देरी हो रही है और नए ऑर्डर भी रुके हुए हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो निर्यातकों को नए बाजारों की तलाश करनी पड़ेगी और व्यापार रणनीति में बदलाव करना होगा।
युद्ध की वजह से महाराष्ट्र के बासमती चावल, केला, अंगूर और प्याज का निर्यात प्रभावित हो रहा है। मुंबई पोर्ट पर सैकड़ों कंटेनर फंस गए हैं, जिससे भाव गिर गए हैं।
Updated on:
02 Apr 2026 08:03 am
Published on:
02 Apr 2026 08:01 am
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