
(Photo-AI)
अधिकतर पिता अपनी बेटियों की शिक्षा और भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। बेटियां उनकी सुनें या न सुनें, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता। उनका मार्गदर्शन करना, उनकी सलामती की फिक्र करना हर पिता अपना कर्तव्य समझता है। वहीं अब बेटियां भी दो तरह की हैं। एक वे जिन्हें भविष्य की परवाह नहीं है और दूसरी वे जो पढ़ाई-लिखाई में रुचि रखती हैं। देश-दुनिया के बारे में जानती हैं। उस पर विमर्श करती हैं। चर्चित जासूसी कथा लेखक मुकेश भारद्वाज जब अपने उपन्यास का ताना-बाना बुन रहे होंगे, तो निश्चय ही उनके मन में बदलते समाज के बीच बेटियों के लिए फिक्रमंद पिता की तस्वीर रही होगी। वहीं, उन्होंने प्रेम और मित्रता में उपजे स्वार्थ का बेहद बारीकी से पोस्टमार्टम करते हुए एक ऐसी जासूसी कथा रची जो पाठकों को दिमागी तौर पर एक यात्रा के लिए भी तैयार करती है।
इस उपन्यास का अहम पात्र अभिमन्यु है। वह नए जमाने का जासूस है। छह फुटा पंजाबी नौजवान जो गोली की रफ्तार से अपनी कार चलाता है। पलक झपकते ही कहीं भी नमूदार हो जाता है। वह अपने अंदाज में जासूसी करता है। पुलिस अपने काम को अंजाम दे, इससे पहले ही वह अपना काम कर चुका होता है। अपराधी को घेरने के लिए हर वो तकनीक अपनाता है जो आज के दौर में जरूरी है।
‘माया ही मोक्ष है’ को पढ़ते हुए आप मूकदर्शक बन रहे समाज को देख सकते हैं। अपराध घटित हो जाता है, लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं होती। हमारे आसपास इतना सन्नाटा पसरा है कि पड़ोस में हत्या हो जाए, तो बगल के फ्लैट में रह रहे परिवार तक को खबर नहीं होती। इस उपन्यास को पढ़ते हुए पंजाब से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक आप चलते रहते हैं। मंडी हाउस से लेकर प्रीत विहार और गाजियाबाद से लेकर कुंडली तक चल देते हैं कहानी के पात्र के साथ। अभिमन्यु के साथ आपका दिमाग भी दौड़ता जाता है कि अब आगे क्या होगा? कथा लगातार कौतुहल बनाए रखती है।
मुकेश भारद्वाज जब जासूसी कथा रचते हैं, तो वे रहस्य की परतें आसानी से नहीं खोलते। जब धीरे-धीरे परतें उधेड़ते हैं, तो पाठक अचरज में पड़ जाता है। माया इस उपन्यास की खास किरदार है। उसे केंद्र में रखते हुए लेखक ने तीन स्त्रियों की कथा बुनी है। मगर इन्हीं में से एक का त्रिया चरित्र खोलते हैं, तो वह समाज की उन स्त्रियों का प्रतीक बन कर सामने होती है जो पति के जीवित रहते बेशर्मी से किसी गैर-मर्द से संबंध रखती हैं। मगर जब उन्हीं की बेटियां किसी स्वार्थी प्रेमी के जाल में उलझती हैं, तो उन्हें घर-परिवार और इज्जत की चिंता होने लगती हैं। उनका यह दोहरा चरित्र निराश करता है।
प्रेम करना एक प्रार्थना है। यह पाप नहीं है। चाहे दुनिया की नजरों से बचा कर करें या सबके सामने, लेकिन इतना साहस होना चाहिए कि बुरे वक्त में उससे आंखें न मूंद लें। लेखक ने शेफाली का चरित्र गढ़ते हुए प्रेम के पतन की गाथा लिखी है।
शेफाली लुधियाना के स्वर्ण कारोबारी स्वर्ण स्कंद की पत्नी है। उसे न तो पति से प्रेम है, न उसकी प्रतिष्ठा की चिंता। वह अपनी जिस्मानी जरूरतें पूरी करने के लिए कॉलेज के जमाने के दोस्त अनिल से सबंध रखती है। यह प्रेम नहीं है। मगर अनिल को उसकी फिक्र रहती है। उसे शेफाली की बेटी सोना की चिंता है। यहां तक कि उसे बचाने के लिए वह जान हथेली पर रख लेता है। एक पिता जैसी फिक्र उसे मौत के मुंह में ले गई। मगर यह कैसा प्रेम है कि उसके अंत समय में शेफाली उससे किनारा कर लेती है। वह दो बूंद आंसू बहाना तो दूर, उसे अंतिम बार देखने तक नहीं जाती। यह आधुनिक दौर में प्रेम का ऐसा स्याह पक्ष है, जिसे कथाकार ने निर्ममता से सामने रखा है।
इस उपन्यास की सबसे युवा पात्र सोना आज की पीढ़ी की ऐसी लड़की है जो अपने प्रेमी के हाथों न केवल छली गई, बल्कि भयादोहन का शिकार भी हुई। जीवन में प्रेम का कोई मौका न गंवाने वाली इस लड़की ने सोचा भी नहीं था कि वह विश्वासघात का शिकार होगी और उसकी जान पर बन आएगी। वह ऐसे प्रेमी के जाल में उलझी जिसने उससे लाखों के जेवरात के साथ एक बड़ी रकम झांसा देकर लूट ली। यहां तक कि जहर देकर उसकी जान भी लेने की कोशिश की। दूसरी ओर अपनी बेटी को बचाने के लिए स्वर्ण स्कंद चिंता में डूबे नजर आते हैं। उसके लिए वे दिल्ली के जासूस अभिमन्यु की मदद लेते हैं। पिता बेटी को बचा तो लेता है, लेकिन वह खुद बिखर जाता है। इस उपन्यास में प्रेम की यह सबसे विद्रूप कहानी है। यह सबक है उन लड़कियों के लिए जो प्रेम में सब कुछ सौंप कर खाली हाथ रह जाती हैं।
लेखक की सबसे खास किरदार माया है। उसे अपने जाल में लेने आया अभिमन्यु स्वयं उसके प्रेम जाल में उलझ जाता है। यह लड़की गरिमा गुप्ता कब माया में बदल गई, इसे जानने के लिए उसके बनते-बिगड़ते व्यक्तित्व से आपको रूबरू होना पड़ेगा। भागलपुर की यह युवती असाधारण है। हालात की शिकार गरिमा के लिए उसके प्रोफेसर पिता की चिंता भी साफ झलकती है। वे बेटी को सभी उलझनों से बाहर निकालने के लिए जतन करते हैं। उसे दिल्ली भेजने के लिए स्टेशन तक छोड़ आते हैं।
‘माया ही मोक्ष है’ का कथानक कौतुहल भरा है। लेखक का ‘सेंस आफ ह्यूमर’ चेहरे पर मुस्कान ले आता है। उनका जासूस अभिमन्यु गलतियां भी करता है, और उन्हें कबूल करता हुआ दिखता है। मगर यह भी तय है कि अपराधी का पीछा करने में वह कोई चूक नहीं करता। उसे अंजाम तक पहुंचा ही देता है। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि अगर उसे माया का साथ न मिलता तो शायद अपराधी तक पहुंचने में देर हो जाती। दोनों ही पात्र ऐसे हैं कि उन्हें लगता है कि वे एक-दूसरे की मंजिल हैं। ऐसे ही साथी की तो उन्हें तलाश थी। माया के माया जाल में उलझने के लिए अगर अभि तैयार है, तो माया भी भला कहां पीछे रहने वाली है। वह अतीत को भूल जाने और आाफत बन चुके प्रेमी अर्शदीप से मुक्त होकर अभिमन्यु का हाथ थाम कर चलने के लिए तैयार है। ये दोनों मिल कर एक अपराधी को आखिरकार पकड़वा ही देते हैं। इस उपन्यास का नायक महज दिलफेंक जासूस भर नहीं है। उसे परिपक्व प्रेमी बनते हुए देख सकते हैं। इस उपन्यास का अंत उसके पूरे व्यक्तित्व के बदलाव की शुरुआत है।
लेखक मुकेश भारद्वाज पत्रकारीय पेशे में रहते हुए कोई दशक भर पहले जासूसी कथा की दुनिया में आए। वे अपने हर उपन्यास में सामाजिक विसंगतियों को सामने लाने का सामाजिक सरोकार भी निभाते हुए दिखे। उन्होंने एक ऐसे किरदार को जीवंत किया जो उनकी नजरों से देखता है। कई बार लगता है कि अभिमन्यु में वे खुद उतर गए हैं। यह नायक हमारे आसपास ही महसूस होता है। उनकी कथा का परिवेश काल्पनिक नहीं है। ये सभी वही जगह हैं, जहां से आप कभी गुजरे हों। उनका उपन्यास 'माया ही मोक्ष है' इंडिया नेटबुक्स से हाल में ही प्रकाशित हुआ है।
Published on:
07 Jan 2026 04:25 pm
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