
बुराई पर सच्चाई और साहस की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाने वाला पर्व दशहरा भारत के मुख्य त्योहारों में से एक है। इस साल दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व गुरुवार, 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा। देश भर में अलग अलग तरह से इस त्योहार को मनाया जाता है। इसे मनाने की हर राज्य की अपनी परंपरा है और व्यवस्था है। कहीं रावण दहन के साथ तो कहीं रामलीला मंचन के साथ भगवान राम द्वारा अहंकारी रावण पर मिली महा-जीत के त्योहार को मनाया जाता है। आइए जानते है कि देश के किस हिस्से में दशहरा कैसे मनाया जाता है।
देश भर में जहां दशहरे को रावण के ऊपर राम भगवान की जीत के जश्न के रूप में मनाया जाता है। वहीं पश्चिम बंगाल, ओडिशा, और त्रिपुरा जैसे पूर्वी राज्यों में यह देवी दुर्गा की महिषासुर नामक भैंस राक्षस पर विजय का त्योहार है। इसकी तैयारी महीनों पहले ही शुरु हो जाती है। नवरात्रा की शुरुआत के साथ ही माता के बड़े बड़े पंडाल लग जाते है। इन पंडालों को अलग अलग थीम पर सजाया जाता है। इन रंग-बिरंगे पंडालों में स्वादिष्ट और पवित्र भोग परोसे जाते है और ढाक की थाप पर धुनुची नृत्य किया जाता है। दशहरे के दिन को यहां मुख्य रूप से दुर्गा पूजा के भव्य समारोह के अंत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देवी की मूर्तियों को पंडालो से ले जाकर नदियों और तालाबों में विसर्जित किया जाता है। माता के विसर्जन के मौके पर महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर लगा कर सिंदूर खेला खेलती है और सभी एक दूसरे को शुभ बिजया कह कर शुभकामनाएं देते है।
हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में मनाया जाने वाला दशहरा बाकी देश से बिलकुल अलग है। इसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी, जब राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ (श्री राम) की मूर्ति को सिंहासन पर स्थापित करके उन्हें घाटी का शासक देवता घोषित कर दिया था। इस कारण, कुल्लू में रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता है। यह उत्सव देवी हिडिम्बा को मनाली से कुल्लू लाकर शुरू किया जाता है, जहां वह भगवान रघुनाथ और अन्य देवताओं के साथ एक भव्य शोभायात्रा में शामिल होती हैं। सात दिनों तक धालपुर मैदान में सांस्कृतिक मेले और प्रदर्शनियां आयोजित की जाती हैं, और अंत में झाड़ियों को जलाकर प्रतीकात्मक रूप से लंका का विनाश दर्शाया जाता है। आखिरी दिन, देवताओं के रथ को पवित्र ब्यास नदी में विसर्जित कर दिया जाता है, जो इस अनूठी विरासत का समापन करता है।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा घाटी के बीच बसे बैजनाथ कस्बे में दशहरा पर रावण के पुतले नहीं जलाए जाते है। यहां न तो किसी तरह के मेले लगते है और न ही कोई आयोजन किए जाते है। दशहरे के त्योहार पर यहां कोई धूमधाम और आतिशबाजी नहीं होती। भगवान शिव के प्राचीन मंदिर के लिए प्रसिद्ध इस जगह पर रावण के पुलते जलाने के बजाय दशहरे के दिन उसका श्राद्ध किया जाता है। यह स्थान रावण की तपोस्थली है क्योंकि यहीं रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। इसी के चलते यहां रावण को राक्षस की बजाय भगवान शिव का भक्त माना जाता है। यहां के लोग रावण को एक महाशिवभक्त और विद्वान मानते है और इसी के चलते दशहरे वाले दिन उसे सम्मान देने के लिए उसका श्राद करते है।
मैसूर का दशहरा एक भव्य दस दिवसीय त्योहार है जो शाही विरासत और पवित्र परंपरा का सुंदर मिश्रण है। यह उत्सव मुख्य रूप से देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित है, जिन्होंने राक्षस महिषासुर का वध किया था। उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण मैसूर महल है, जो हर शाम 7 बजे से 10 बजे तक 1 लाख बल्बों से जगमगाता है। महल के सामने सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियां होती हैं, जो माहौल को जीवंत बना देती हैं। त्योहार का समापन एक विशाल जुलूस के साथ होता है, जहां देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को सजे हुए हाथी पर बैठाकर शहर की सड़कों पर घुमाया जाता है, और रात में शहर के बाहर मशालों की परेड के साथ यह उत्सव समाप्त होता है।
गुजरात में, नवरात्रि खत्म होने पर दशहरा का त्योहार बहुत उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इन दिनों लोग उपवास रखते हैं और देवी की पूजा करते हैं। पुरुष और महिलाएं रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े पहनकर इकट्ठा होते हैं और गुजरात के खास लोकनृत्य गरबा और डांडिया करते हैं। लोकगीतों और संगीत से माहौल बहुत ही मनमोहक हो जाता है। नवरात्रि के आखिरी दिनों में कई भक्तजन आशपुरा माता, अम्बाजी और चामुंडा माता जैसे पवित्र मंदिरों की यात्रा के लिए भी जाते हैं।
Published on:
01 Oct 2025 03:41 pm
बड़ी खबरें
View Allबिहार चुनाव
राष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
