
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी महर्षि वेदव्यास पुरस्कार से सम्मानित (Photo-Patrika)
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी को रविवार को महर्षि वेद व्यास प्रतिष्ठान की ओर से महर्षि वेदव्यास पुरस्कार से सम्मानित किया गया। रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविन्द गिरी के पुणे के समीप आलंदी स्थित वेद श्री तपोवन में कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य विजयेन्द्र सरस्वती के सान्निध्य में यह समारोह हुआ। कोठारी को यह सम्मान वैदिक क्षेत्र में शिक्षा, अनुसंधान और लेखन के रूप में उनके सुदीर्घ कार्य के लिए प्रदान किया गया। मुख्य अतिथि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तथा स्वामी गोविन्द गिरी ने कोठारी को सम्मान स्वरूप शॉल, गणेश प्रतिमा व प्रशस्ति-पत्र भेंट किया।
समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि कोठारी के चिंतन व लेखन में आधुनिक दौर की कई समस्याओं के समाधान के रास्ते हैं। बिरला ने कांची कामकोटि के शंकराचार्य को ज्ञान, सेवा और धर्म का समन्वय बताते हुए कहा कि वे विद्या वेद और वैद्य के रूप में अच्छी विद्या, संस्कार व लोगों के स्वस्थ जीवन के लिए मानवीय सेवा का काम कर रहे हैं। वहीं गोविन्द गिरी जी महाराज अलग-अलग राज्यों में भारतीय शिक्षा, ज्ञान परंपरा और व्यक्ति के जीवन को परिवर्तित करने वाली गुरुकुल प्रणाली की शिक्षा लोगों तक पहुंचाने में जुटे हैं।
लोकसभा अध्यक्ष ने गुलाब कोठारी को नैतिक पत्रकारिता का प्रतिमान बताते हुए कहा कि वे अपनी कलम से जनआकांक्षाओं और जनविचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। उन्हें प्रदान किया गया वेदव्यास सम्मान सिर्फ एक लेखक का सम्मान नहीं बल्कि नैतिकता का दीप जलाकर समाज में प्रकाश फैलाने वाले व्यक्तित्व का सम्मान है। उन्होंने अपने चिंतन के अंदर वेदों के आलोक में समाज की वर्तमान चुनौतियों को देखा उनके समाधान के रास्ते बताए।
वेद विज्ञान को सहज भाषा में लोगों तक पहुंचाने के उनके प्रयास हमें प्रेरणा देते हैं। बिरला ने कहा कि एक संपादक के रूप में सत्य को साहस के साथ लिखने वाले कोठारी ने वेद-उपनिषद् के विज्ञान की जो विवेचना की वह आधुनिक जीवन की कई समस्याओं का समाधान देती है। सहज और सरल भाषा में उनके प्रत्येक आलेख, स्तंभ और ग्रंथ वेद विज्ञान के अद्भुत ज्ञान से परिपूर्ण हैं।
समारोह के मुख्य यजमान अभय भूतड़ा, वेद व्यास प्रतिष्ठान के न्यासी, संत व बड़ी संख्या में वैदिक विद्वान मौजूद थे। लोकसभा अध्यक्ष ने इस मौके पर वेद श्री तपोवन परिसर में दूसरे चरण के निर्माण कार्य का भी शुभारंभ किया।
रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविन्द गिरी ने कहा कि पिता कर्पूर चन्द्र कुलिश की परंपरा को गुलाब कोठारी ने आगे बढ़ाया है। वेदों में विज्ञान क्या है? यह जानने के लिए कुलिश व कोठारी को पढ़ना होगा। पंडित मधुसूदन ओझा के कठिन साहित्य को पत्रिका में सरल भाषा में प्रकाशित करने का जो कार्य हुआ है उसकी तुलना भारत भर में नहीं की जा सकती।
शंकराचार्य विजयेन्द्र सरस्वती ने कहा कि गुलाब कोठारी वेदों के प्रचार के लिए प्रतिदिन पत्रिका में भव्य स्थान देकर धार्मिक चिंतन करते हैं। उनके प्रयासों, विद्वता व सेवा कार्यों का सम्मान करने के लिए इस वर्ष उन्हें महर्षि वेदव्यास पुरस्कार से सम्मानित करना श्रेष्ठ निर्णय है।
उन्होंने समारोह को राजस्थान का पुष्कर महोत्सव बताया। जैसे पुष्कर में ब्रह्मा चार मुंह से चारों वेदों का हमेशा उच्चारण करते हैं। वैसे ही स्वामी गोविन्द गिरी, ओम बिरला, गुलाब कोठारी व कार्यक्रम के मुख्य यजमान भी राजस्थान से हैं। लगता है कि यह राजस्थान का पुष्कर महोत्सव धर्म-संस्कृति और मानवता के विकास के काम करने के लिए हुआ है।
अपने सम्मान के प्रति आभार जताते हुए गुलाब कोठारी ने कहा कि किसी वणिक पुत्र ने यह नहीं सोचा होगा कि उसके जीवन में कभी वेदव्यास सम्मान मिलेगा। यह गुरु की कृपा के अलावा कुछ नहीं है। जब गांव से शहर में आया तब पिताजी के काम को देखने का अवसर मिला। जब पच्चीस साल पार कर चुका तो उनके सब प्रयासों को साक्षी भाव से देखा जो वेद विज्ञान को पल्लवित करने के लिए वेद विज्ञान सम्मेलन, विद्वानों को आमंत्रित करने और स्वयं लिखने से जुड़े थे। मैं वायुसेना से आया था।
वेद विज्ञान मेरे लिए ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ था। ऐसे ही एक सम्मेलन में एक बुजुर्ग ब्राह्मण से चर्चा हुई और मेरे प्रश्नों पर मेरा हाथ पकड़ कर कहा ‘आज मिल गया’। वे मुझे पिताजी के पास ले गए और कहा मैं आपसे बेटा मांगने आया हूं। जवाब था- इसी से पूछो। मेरे लिए तो जैसे घर बैठे गंगा आ गई। मैंने हां भर दी। सन 2000 में ऐसे पं. देवीदत्त चतुर्वेदी ने मेरी अंगुली पकड़ी।
तब तक गीता को कृष्ण-अर्जुन संवाद के रूप में पढ़ता था। उन्होंने कहा-अर्जुन बनकर समझो। जो कृष्ण बोल रहे हैं- तुम्हारे लिए बोल रहे हैं। तब गीता सहित वेद-विज्ञान को समझने की दृष्टि बदल गई। विश्व में दो ही चीजें हैं- ब्रह्म और माया। अन्य कुछ नहीं। विज्ञान भी मैटर और एनर्जी बताता है। गीता ब्रह्म और कर्म का शास्त्र है। जैसे सृष्टि में पुरुष भाव एक ही है, माया भी एक ही है। ब्रह्म भीतर की चीज है। बाहर माया है। ब्रह्म को जानने के लिए भीतर जाना पड़ेगा। बाहर मैं जितना जानता हूं वह सब माया है।
आज ज्ञान परंपरा का जो सूत्र उपलब्ध है उसमें केवल बाहर के जीवन की बात है। जो ज्ञान प्रगट हो गया, किताबों में भी आ गया, पढ़ाया भी जाने लगा वह सिर्फ माया है। उसे प्रचारित-प्रसारित कर सकते हो लेकिन उसमें ब्रह्म नहीं है। ब्रह्म के लिए तो हमें भीतर ही जाना पड़ेगा। मुझे लगता है, ईश्वर की व गुरु की कृपा से कुछ लोग ही होंगे चलकर गुरु की तरफ आते हैं या गुरु उन्हें ढूंढ कर लाते होंगे। वही सूत्र है, वही तत्व है जो मुझे चलाए जा रहा है।
Updated on:
01 Dec 2025 04:48 pm
Published on:
01 Dec 2025 04:47 pm
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