
अमेरिका में अवैध रूप से रहने पर बंधक बना कर भारत भेजे गए युवा । ( फाइल फोटो: द वॉशिंगटन पोस्ट)
The H-1B Trap Fraud Against Indian Entrepreneurs : अक्सर भारतीय अमेरिका जा कर वहां अच्छी जिन्दगी जीना चाहते हैं। इनमें से कई छोटे कामगार भी अच्छी कमाई का सपने बुनते हैं और जैसे-तैसे किसी एजेंट के माध्यम से बमुश्किल अमेरिका चले जाते हैं और बाद में ठगे जाने पर पछताते हैं। यूएस से ऐसे कई मामले सामने आए हैं,जब बॉडी शॉप कही जाने वाली कुछ देसी कंसल्टेंसी एजेंसियां उन्हें ठग रही हैं। पत्रकार और फिल्म समीक्षक तनुल ठाकुर ने अपनी नई किताब ' Wild Wild East: Exiled Americans, Enslaved Indians and the Systemic Abuse of the H-1B Visa Programme' (वाइल्ड वाइल्ड ईस्ट: देश से निकाले गए अमेरिकी, गुलाम बनाए गए भारतीय और एच बी 1 बी वीजा प्रोग्राम का सुनियोजित दुरुपयोग) में ठाकुर ने इन 'देसी कंसल्टेंसी फर्म' की करतूतों का खुलासा किया है। उनके अनुसार एच-1बी वीजा का यह सपना कभी-कभी फर्जी नौकरियों, जाली बायोडाटा, वीजा पर निर्भरता के साथ बिना वेतन के काम करने और देश से निकाले जाने की धमकियों वाले बुरे सपने में बदल जाता है।
हजारों भारतीय छात्रों और ग्रेजुएट लोगों के लिए, एच-1 बी वीजा 'अमेरिकन ड्रीम' सच करने का एक जरिया मात्र है, जिसमें एक पक्की नौकरी, अच्छी-खासी सैलरी और आगे चल कर अमेरिका में स्थायी रूप से रहने का मौका मिलना शामिल है। लेकिन, कभी-कभी यह सपना बुरे सपने में बदल सकता है, जिसमें फर्जी नौकरी, सैलरी न मिलना और शोषण करने वाले तौर-तरीके जैसी मुश्किलें शामिल मसलन संदिग्ध वर्कप्लेस, फर्जी नौकरी बायोडाटा, सैलरी रोक लेना और देश से निकालने की धमकी शामिल है।
इंडस्ट्री में आम तौर पर 'बॉडी शॉप्स' के नाम से जानी जाने वाली ये देसी कंसल्टेंसी, भारतीय टेक्निकल कर्मचारियों और अमेरिकी नियोक्ताओं के बीच मध्यस्थ का काम करती हैं। टीसीएस या कॉग्निजेंट जैसी बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों के विपरीत, इनमें से कई कंपनियां न तो अपने प्रोडक्ट बनाती हैं और न ही टेक्निकल सेवाएं देती हैं। इनका बिजनेस मॉडल रिक्रूटर, सब-कॉन्ट्रैक्टर और एम्प्लॉई सर्विस वेंडर के माध्यम से बड़ी कंपनियों, यूनिवर्सिटी या फॉर्च्यून 500 कंपनियों को कर्मचारी उपलब्ध कराने पर आधारित है।
यह मॉडल अपने आप में कानूनी है और कई तरह के उद्योगों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। हालाकि, आलोचकों का तर्क है कि कुछ कंसल्टिंग कंपनियां एच-1बी सिस्टम की कमियों का फायदा उठाती हैं और ऐसे कमज़ोर कर्मचारियों का शोषण करती हैं जो अमेरिका में अपनी जगह बनाने के लिए बेताब होते हैं।
ठाकुर के अनुसार, अमेरिका में कई भारतीय ग्रेजुएट या जो वहां जाने की इच्छा रखते हैं, उन्हें ऐसे ऑफर मिलते हैं जिन पर यकीन करना मुश्किल होता है। किसी कैंडिडेट से बात करने के कुछ ही मिनटों के अंदर, और उनकी टेक्निकल स्किल्स या अनुभव परखे बिना ही, रिक्रूटर उन्हें आईटी नौकरियां, एच-1 बी स्पॉन्सरशिप, अच्छी सैलरी और कभी-कभी ग्रीन कार्ड पाने का रास्ता भी ऑफर कर देते हैं।
जब कर्मचारियों को पता चलता है कि असल में जिस नौकरी का वादा किया गया था, वह या तो कहीं है ही नहीं, या फिर यह इस बात पर निर्भर करता है कि कंसल्टेंसी को कोई ऐसा क्लाइंट मिल जाए जो उन्हें काम पर रखने के लिए तैयार हो। ठाकुर की किताब के अनुसार, अमेरिकी कर्मचारी भी कर्मचारी ही हैं और उन्हें पता है कि उन्हें भारत से कर्मचारियों से किए गए वादों के साथ और जरूरी दस्तावेज के साथ लाया गया है।
इस पुस्तक में जिन सबसे विवादास्पद परिपाटियों पर चर्चा की गई है, उनमें से एक है बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए बायोडाटा और प्रॉक्सी इंटरव्यू का इस्तेमाल शामिल है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के कॉम्पिटिटिव मार्केट में नौकरी पाने के लिए, हाल ही में ग्रेजुएट हुए लोगों या दूसरे क्षेत्रों के प्रोफेशनल्स से यह उम्मीद की जाती है कि वे खास टेक्नोलॉजी में सात या आठ साल का झूठा अनुभव दिखाएं।
खबरों के मुताबिक, कुछ कर्मचारियों को कुछ सप्ताह की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसके बाद उन्हें इंटरव्यू के लिए भेजा जाता है, जहां कोई दूसरा व्यक्ति उनकी जगह टेक्निकल सवालों के जवाब दे सकता है। किसी क्लाइंट कंपनी में तैनात किए जाने के बाद, वे अक्सर ऐसे काम करने के लिए दूर बैठे एक्सपर्ट्स से "ऑन-द-जॉब सपोर्ट" लेते हैं, जिनके लिए उन्हें कभी ट्रेनिंग नहीं दी गई थी।
किताब के अनुसार, अमेरिका पहुंचने के बाद भी मजदूरों का शोषण खत्म नहीं होता। ठाकुर ऐसे मामलों का जिक्र करते हैं जहां प्रोजेक्ट असाइनमेंट का इंतजार करते समय कई मजदूरों को छोटे से अपार्टमेंट में एक साथ रखा जाता है। जब मजदूर "ऑन द बेंच" होते हैं, यानि उन्हें अभी तक किसी क्लाइंट के लिए काम नहीं सौंपा गया होता है तो उन्हें मजदूरी मिलने में महीनों की देर हो सकती है और सितम यह है कि बिना किसी चेतावनी के उसमें कटौती की जा सकती है, या उसे पूरी तरह रोका जा सकता है।
ठाकुर ने इस बात पर जोर दिया है कि वीजा धोखाधड़ी किसी एक राज्य या समुदाय तक सीमित नहीं है, और पूरे दक्षिण एशिया के लोग इस सिस्टम में शामिल हैं। लेखक ने कई सुधारों का सुझाव दिया है, जिनमें वेतन से जुड़ी सख्त शर्तें, स्टाफिंग फर्मों की ज्यादा सख्त जांच-पड़ताल और वीजा को पोर्टेबल बनाना शामिल है, ताकि वर्कर अपना कानूनी स्टेटस खतरे में डाले बिना अपना एम्प्लॉयर बदल सकें। उन्होंने श्रम कानूनों का उल्लंघन करने या वीजा धोखाधड़ी में लिप्त पाई जाने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की भी वकालत की है।
अमेरिका में उनका कानूनी स्टेटस उनके एम्प्लॉयर द्वारा स्पॉन्सर किए गए वीजा पर निर्भर करता है, इसलिए कई वर्कर शिकायत करने या नौकरी बदलने में असमर्थ महसूस करते हैं कानूनी दर्जा खोने, देश से निकाले जाने या ब्लैकलिस्ट किए जाने के डर ये अक्सर वे चुप रहने पर मजबूर होते हैं। दुनिया भर में रोजगार से जुड़े कई अन्य वीजा के उलट, H-1B वीजा कर्मचारी के बजाय उसे स्पॉन्सर करने वाले नियोक्ता से जुड़ा होता है। इससे पावर का असंतुलन पैदा होता है, क्योंकि कर्मचारी उस कंपनी पर निर्भर हो जाते हैं जो उनके इमिग्रेशन स्टेटस कंट्रोल करती है।
ठाकुर अपनी किताब में तर्क देते हैं, 'सस्ते और मजबूर मजदूर मिल जाना ही इस सिस्टम को बेईमान लोगों के लिए आकर्षक बनाता है।' जो मजदूर अपने एम्प्लॉयर को छोड़ देते हैं, उन्हें इमिग्रेशन स्टेटस छिनने का खतरा रहता है, जब तक कि उन्हें जल्द ही कोई दूसरा स्पॉन्सर न मिल जाए।
Published on:
29 Jun 2026 01:46 pm
बड़ी खबरें
View Allराष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
