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अगले कुछ वर्षों में हम ‘क्लाइमेट चेंज रिफ्यूजी’ बनने की ओर अग्रसर हैं- राजेंद्र सिंह

-'वॉटर मैन ऑफ इंडिया'के नाम से विख्यात जल संरक्षणवादी और पर्यावरणविद ने 'राजस्थान पत्रिका' से की खास बातचीत

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Rajendra Singh

Rajendra Singh

जयपुर। भारत समेत पूरी दुनिया में घटता भूजल-स्तर और पीने योग्य पानी की समस्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। भारत समेत कई बड़े देश इसका सामना कर रहे हैं। बुधवार को जयपुर में पूर्वी राजस्थान के १३ जिलों में सूखे की मार पर बनी डॉक्यूमेंट्री 'चंबल की चिट्ठी' का जवाहर सर्किल स्थित एक सिनेमाहॉल में आधिकारिक प्रीमियर किया गया। सूखे से त्रस्त पूर्वी राजस्थान की ३ करोड़ आबादी के समर्थन में आवाज बुलंद करने आए रैमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और 'जल पुरुष' के नाम से विख्यात जल संरक्षणवादी और पर्यावरणविद राजेन्द्र सिंह नेे 'राजस्थान पत्रिका' से खास बातचीत में कहा कि प्रदेश में दोनों पार्टियों की सरकारें दलगत राजनीति के चलते १३ जिलों के लोगों के सूखे कंठ को पानी मुहैया करवाने में विफल रही हैं। सिंह ने कहा, 'दोनों पार्टियां इस योजना की सफलता का श्रेय लेना चाहती हैं। दोनो ही पार्टियां इसी फिराक में हैं। यही वजह है कि ऐसी जनकल्याणकारी योजनाएं राजनैतिक दलों की प्राथमिकताओं में पिछड़ जाती हैं। चूंकि, योजना राष्ट्रीय स्तर की है, इसलिए इसकी अधिक जिम्मेदारी तो केंद्र सरकार पर ही है। इसलिए भारत सरकार को इसे जल्द मूर्त रूप देना चाहिए, क्योंकि प्रधानमंत्री ने पहले ही इस योजना की घोषणा की दी थी। मेरा नजरिया है कि इस परियोजना में राजनीति ज्यादा हो रही है और काम कम।


हम 'क्लाइमेट रिफ्यूजी' बनने की ओर बढ़ रहे हैं

मैं राजस्थान की बात करूं तो, यहां ७२ फीसदी भूजल स्तर (भूमिगत जल स्रोत) नीचे चला गया है। वहीं, पूरे भारत में ६२ फीसदी भूजल स्तर नीचे चला गया है। इससे आने वाले वर्षों में भूजल की कमी से जो चुनौतियां सामने आएंगी, वह अगली पीढ़ी के लिए विनाशकारी हो सकती हैं। कुछ दशक पहले तक, जब बारिश नहीं होती थी, तो लोग कुंए, बावडिय़ों और ट्यूबवैल जैसे संसाधनों से काम चला लेते थे, लेकिन अब तो भूजल ही खत्म होने की कगार पर है। ऐसे में बारिश न होने पर समस्या तो होनी है। मैं न तो डरना चाहता हूं, न ही डराना चाहता हूं, लेकिन जल संकट के कारण कई देशों के लोग पलायन कर यूरोपीय देशों का रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें 'जलवायु परिवर्तन शरणार्थी' कहा जा रहा है। भारत के लिए अभी यह नजरिया नहीं है। हालांकि, ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाले कुछ वर्षों में हम भी 'क्लाइमेट रिफ्यूजी' बनने जा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन का है, जहां पीने का पानी खत्म होने के बाद सरकार ने लोगों को पेयजल उपलब्ध करवाने से हाथ खड़े कर दिए थे। यानी हमारे भविष्य के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।

पड़ोसी देश में भी हालात खराब

राजेन्द्र सिंह ने आगे कहा, 'पाकिस्तान, बांग्लादेश और अब नेपाल भी इस समस्या का सामना कर रहा है। जब हमें आजादी मिली थी, तो देश की मात्र एक फीसदी भूमि बाढग़्रस्त रहती थी। तब बिहार, बंगाल और ओडिशा ही बाढ़ से त्रस्त थे। आज भारत की ३० फीसदी भूमि पर बाढ़ आती है और लोगों को उजाड़ते हुए, समुद्र में चला जाता है, लेकिन हम इस पानी का समुचित उपयोग जनहित में नहीं कर पा रहे हैं। वहीं, आजादी के समय कुल ४ फीसदी भूमि जल संकट का सामना कर रही थी। योजना आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि तब कुल २३२ गांव ही इस संकट से जूझ रहे थे। आज यह आंकड़ा बढ़कर गांव की संख्या ५० हजार से ऊपर हो गई है। आज भारत में ६० फीसदी भूमि पर रहने वाले लोगों के पास पीने के लिए खेती, उद्योग और पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है। अब भारत की स्थिति बिगड़ रही है, जिस पर जल्द से जल्द पुख्ता काम करने की जरुरत है।'

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