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भारत में कार्बन उत्सर्जन बढ़ने की दर दो दशक में हुई सबसे कम

India's Carbon Emissions: भारत में कार्बन उत्सर्जन बढऩे की दर दो दशक में सबसे कम हुई है। क्या कहते हैं आंकड़े? आइए नज़र डालते हैं।

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भारत

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Tanay Mishra

Mar 27, 2026

Carbon emissions in India

Carbon emissions in India

वैकल्पिक ऊर्जा उपायों के ज़रिए भारत (India) अपने कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emissions) को कम करने में सफलता पाता दिख रहा है। बीते वर्ष भारत में कार्बन डाईऑक्साइड (सीओटू) के उत्सर्जन की दर 0.7% रही। विश्लेषकों के अनुसार यह बीते दो दशक में सबसे कम वार्षिक दर है। ब्रिटेन के सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के अनुसार कार्बन उत्सर्जन में बढऩे की 4% से 11% बीते चार सालों में थी जिसमें काफी ज़्यादा कमी देखी गई है।

कोरोना काल के दौरान आई कमी से अलग

कार्बन उत्सर्जन में आई यह कमी कोरोना काल के दौरान 2020 में आई कॉर्बन उत्सर्जन में कमी से अलग है। भारत के साथ ही चीन में भी सालाना कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी की दर घट कर 0.3% रही है।

वैकल्पिक ऊर्जा उपायों से बिजली उत्पादन बढ़ाया

रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत में बिजली उत्पादन में होने वाले कार्बन उत्सर्जन में 3.8% की कमी आई है। इस दौरान भारत ने 47 गीगावॉट सोलर ऊर्जा, 6.3 गीगावॉट पवन ऊर्जा, 4 गीगावॉट हाइड्रो पावर और 0.6 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा के ज़रिए बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ाया है।

कोयला आधारित बिजली उत्पादन कम हुआ

रिपोर्ट के अनुसार भारत ने कोयला आधारित बिजली उत्पादन को कम किया है। यह 1973 के बाद आई सबसे बड़ी कमी है। हालांकि वर्ष 2025 में सीमेंट और स्टील उत्पादन में कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है। एक्सपर्ट्स के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में बढ़ोत्तरी के ऊपायों के कारण जैविक ईंधन आधारित बिजली की मांग को नियंत्रित करने में मदद मिली है।

कार्बन उत्सर्जन है प्रकृति के लिए बेहद खतरनाक

कार्बन उत्सर्जन प्रकृति पर गहरा और विनाशकारी प्रभाव डालता है। मुख्यतः कार्बन डाईऑक्साइड गैस, जो कारखानों, वाहनों और बिजली उत्पादन से निकलती है, वातावरण में ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करती है। इससे वैश्विक तापमान बढ़ता है, ग्लेशियर पिघलते हैं, समुद्र स्तर ऊंचा होता है और तटीय क्षेत्र डूब रहे हैं। चरम मौसम घटनाएं जैसे बाढ़, सूखा, तूफान और जंगल की आग बढ़ गई हैं। महासागर अम्लीय हो रहे हैं, जिससे मूंगा रीफ्स नष्ट हो रहे हैं और समुद्री जीवों की कई प्रजातियाँ खतरे में हैं। जैव विविधता कम हो रही है, पौधे-जानवर अपनी आदतें बदल नहीं पा रहे और विलुप्ति का खतरा बढ़ गया है। वन-कटाई उत्सर्जन को और बढ़ाती है, मिट्टी की उर्वरता घटती है तथा कृषि प्रभावित होती है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो रहा है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो रहा है।