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Jallianwala Bagh Massacre: जलियांवाला बाग नरंसहार भारतीय इतिहास में ऐसी घटना है जिसके जख्म आज भी हैं हरे

Jallianwala Bagh Massacre: जलियांवाला बाग नरंसहार भारतीय इतिहास में ऐसी घटना है जिसके जख्म आज भी हरे हैं। घटना के सौ साल बाद भी बर्बरता के निशान मौजूद हैं। इस दिन पंजाब के अमृतसर जिले में स्वर्ण मंदिर के पास जलियांवाला बाग में हजारों भारतीयों पर अंग्रेज हुक्मरान जनरल डायर ने अंधाधुंध गोली चलवाई थी। इस घटना ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।

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Abhishek Kumar Tripathi

Apr 13, 2022

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Jallianwala Bagh Massacre: देश के इतिहास में 13 अप्रैल का दिन अंग्रेजी बर्बरता के रूप में याद किया जाता है। इस दिन अंग्रेजी हुकुमत ने ऐसा दर्दनाक हत्याकांड किया जिसे पूरा देश आज तक नहीं भूल पाया है। आज भी इसके जख्म हरे हैं। ब्रिटिश सरकार रॉलेट एक्ट लाने की तैयारी कर रही थी। इसके विरोध में शांतिपूर्ण सभा के लिए जमा हुए हजारों भारतीयों जिसमें बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं शामिल थी,उन पर अंग्रेज हुक्मरान जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलवा दिया था।

गोलियां चलने से जलियांवाला में चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। वहां से निकलने का एक ही सकरा रास्ता था जिसके कारण हजारों लोग भगदड़ में कुचले गए तो हजारों लोग गोलियों की चपेट में आए। बहुत से लोग तो जान बचाने के लिए वहां मौजूद कुएं में कूद गए जिसमें हजारों लोगों की मौत हो गई। अंग्रेजी सरकार ने इस घटना की जांच के लिए हंटर कमेटी बनाई जिसने वहां मरने वालों की संख्या केवल 379 ही बताई।


उधम सिंह ने लिया बदला

इस घटना के बाद पूरे देश में रोष व्याप्त हो गया। इसके बाद उधम सिंह ने ब्रिटिश सरकार से बदला लेने का मन बना लिया। उधम सिंह ने जनरल डायर और उस समय के पंजाब गवर्नर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की कसम खाई, परन्तु जनरल डायर की मौत 1927 में ब्रेन हेमरेज से हो गई। इसके बाद उधम सिंह के निशाने पर माइकल ओ डायर ही बचा।

13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में एक बैठक रखी गई थी जिसमें माइकल ओ डायर के वहां मौजूद होने की खबर थी। इसके बाद उधम सिंह पिस्टल छिपा कर वहां पहुच गए। उधम सिंह माइकल ओ डायर पर 6 गोलियां चलाई जिसमें से 2 गोली लगीं जिससे उसकी मौत हो गई। इस तरह उधम सिंह ने जलियांवाला बाग नरंसहार का बदला लिया।


युवाओं में इस घटना ने बढ़ाया रोष

इस घटना के बाद युवाओं में रोष बढ़ गया। 1920 में हुए कई क्रांतिकारी आंदोलन के पीछे जलियांवाला नरंसहार का रोष भी था। इस घटना के बाद रामप्रसादबिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह ने अपने क्रांतिकारी ग्रुप में बहुत से युवाओं की भर्ती की। वहीं नरम दल वालों ने भी पूर्ण स्वराज की मांग पर जोर दिया।