
केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि आइपीसी की धारा 498-ए को, जिसमें विवाहित महिला के साथ क्रूरता पर दंड का प्रावधान है, लिव-इन रिलेशनशिप की महिलाओं पर लागू नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सोफी थॉमस ने कहा कि महिला को धारा 498-ए के तहत आश्रय के लिए उसका उस पुरुष से विवाह होना चाहिए, जिस पर क्रूरता का आरोप लगाया जाए। जब विवाह का कोई रूप धार्मिक या प्रथागत हो, तभी महिला धारा 498-ए के तहत सुरक्षा की मांग कर सकती है।
लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला ने कर ली थी आत्महमत्या
कोर्ट ने कहा कि जब विवाह की कोई औपचारिकता नहीं हो और सिर्फ विवाह समझौते के आधार पर लिव-इन रिलेशनशिप हो तो महिला यह कहते हुए धारा 498-ए के तहत आश्रय नहीं मांग सकती कि वे लंबे समय तक साथ रहने के कारण पति-पत्नी के रूप में समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। कोर्ट ने 1997 में एक महिला की मौत के लिए धारा 498-ए और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत एक व्यक्ति और उसके भाई की दोष सिद्धि और सजा को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
आरोप है कि महिला कथित तौर पर आरोपी व्यक्ति के साथ भाग गई थी। साथ रहने के कुछ महीने बाद उसकी क्रूरता और उत्पीड़न के कारण महिला ने आत्मदाह कर लिया। पुरुष और उसके परिवार (मां, पिता, भाई) को एक सत्र अदालत ने 1998 में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले को 2000 में अपीलीय अदालत में चुनौती दी गई। बाद में आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की ताकि उन्हें मामले में सम्मानपूर्वक बरी किया जा सके। हाईकोर्ट ने उनकी पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को पलट दिया।
लिवइन रिलेशनशिप की कोई कानूनी हैसियत नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि जोड़े का विवाह नहीं हुआ था। वे वास्तव में विवाह समझौते के आधार पर साथ रह रहे थे जिसकी कोई कानूनी हैसियत नहीं थी। कोर्ट ने पाया कि महिला ने मृत्यु पूर्व बयान में अपने साथी या उसके भाई (पुनरीक्षण याचिकाकर्ता) के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया। मामला लंबित रहने के दौरान व्यक्ति के माता-पिता की मृत्यु हो गई थी। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के खिलाफ आरोप निरस्त हो गए हैं।
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Published on:
21 Oct 2023 09:50 am

