
Rule 176 vs Rule 267: जानिए इन दोनों नियमों के बारे में, जिस कारण मणिपुर पर विपक्ष और सरकार में ठन गई है
Rule 176 vs Rule 267: मणिपुर के बिगड़े हालात पर चर्चा कैसे हो इसके प्रारूप को लेकर मानसून सत्र के पहले दिन सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच ठन गई। इस कारण संसद के मानसून सत्र का पहला दिन स्थगित कर दिया गया। लेकिन सदन में हो रहे हंगामे के बीच रूल 176 और रूल 267 का जिक्र हुआ। एक तरफ मोदी सरकार जहां इस मुद्दे पर कम अवधि की चर्चा के लिए सहमत हुई थी। वहीं, विपक्ष की सभी पार्टियों ने एकसुर में जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नियम 267 के तहत सभी मुद्दों को निलंबित कर चर्चा के बाद खुद संज्ञान लें। जैसे ही इन दोनों नियमों का जिक्र हुआ लोग इस बारे में सर्च करने लगे की आखिर नियम 267 क्या है जिसकी मांग विपक्ष ने मणिपुर मुद्दे पर चर्चा के लिए की है? वहीं रूल 176 के क्या मायने हैं जिसके तहत सरकार कम समय की चर्चा के लिए तैयार है? आइए इन दोनों नियमों को समझने का प्रयास करते हैं।
रूल 267 क्या है? What is Rule 267
आइये सबसे पहले रूल 267 के बारे में जानते हैं जिसकी मांग विपक्ष कर रहा है। इस रूल के मुताबिक राज्यसभा सदस्य को सभापति की मंजूरी से सदन के पूर्व-निर्धारित एजेंडे को निलंबित/ खत्म करने की स्पेशल पॉवर देता है। दरअसल, संसद में एक सदस्य के पास मुद्दों को उठाने और सरकार से जवाब मांगने के कई तरीके बनाए गए हैं। प्रश्नकाल (Question Hour) के दौरान सांसद किसी भी मुद्दे से संबंधित प्रश्न पूछ सकते हैं।
इसके तहत संबंधित मंत्री को मौखिक या लिखित रूप में उत्तर देना होता है। कोई भी सांसद शून्यकाल के दौरान इस मुद्दे को सदन में उठा सकता है। हर दिन 15 सांसदों को शून्यकाल में अपनी पसंद या कम से जुड़े मुद्दे को उठाने की अनुमति होती है। कोई सांसद इसे विशेष उल्लेख के दौरान भी उठा सकता है। अध्यक्ष सत्र के दौरान 7 विशेष उल्लेखों की अनुमति दे सकते हैं।
सांसद राष्ट्रपति के भाषण पर बहस जैसी दूसरी चर्चाओं के दौरान इस मुद्दे को सरकार के ध्यान में लाने का प्रयास कर सकते हैं। नियम 267 के तहत कोई भी चर्चा संसद में इसलिए बहुत महत्व रखती है क्योंकि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर चर्चा के लिए अन्य सभी कामों को रोक दिया जाता है और जो मुद्दा उस वक्त में सबसे जरुरी होता, जो लोगों के लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है उसी पर व्यापक चर्चा की जाती है।
फिलहाल मणिपुर का मुद्दा देश के छाया हुआ है, लंबे वक्त से मणिपुर जातीय हिंसा की आग में जल रहा है, तीन महीने पूरे होने को है लेकिन बुधवार शाम को जब दो महिलाओं के साथ हुई दरिंदगी का वीडियो सामने आया और पूरे देश को झकझोर दिया तब अगले दिन यानी गुरुवार को प्रधानमंत्री मोदी का इस मामले पर पहला बयान दिया।अब इस मामले पर विपक्ष सदन में चर्चा व्यापक चर्चा चाहता है, लेकिन सरकार ने इस मुद्दे को लेकर कम अवधि तय किया है। विपक्षी पार्टियां मणिपुर को लेकर इसी कारण रूल 267 के तहत चर्चा की मांग कर रहा है।
इसके तीन कारण हो सकते हैं?
पहला- सरकार जब इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए राजी हो जाएगी तो उनसे यहां से संबंधित हर प्रश्नों के जवाब देने को कहा जायेगा। चूंकि यहां का मामला काफी बढ़ चुका है। गृहमंत्री अमित शाह खुद निगरानी कर रहे हैं, ऐसे में उन्हें इंटेलिजेंस द्वारा कुछ ऐसे इनपुट मिले हों जिसे साझा नहीं किया जा सकता हो। जिसे साझा करना सुरक्षा से खिलवाड़ करने जैसा हो जाए।
दूसरा- केंद्र और राज्य दोनों जगहों की सरकार मणिपुर में जारी हिंसा को रोकने में पूरी तरह असफल साबित हुई है। यहां से उग्रवादियों ने 5 हजार से ज्यादा हथियार लूटे हैं जिसमें से महज 1500 हथियारों की रिकवरी हो पाई है। कुकी और मेतैई दोनों समुदाय के लोग अपने-अपने इलाकों में सड़क जाम किये हुए थे। पारा मिलेट्री की तैनाती के बावजूद गोलीबारी में कोई कमी नही आई। पीएम मोदी इस मुद्दे पर इतने लंबे वक्त तक चुप क्यों रहे? एन बिरेन सिंह सरकार पर क्या जिम्मेदारी तय की गई? इन उदाहरणों से आप समझ गए होंगे कि सरकार को अपनी विफलता पर जवाब देने में कितनी असहजता महसूस होगी। इसलिए इस मुद्दे पर चर्चा के लिए कम अवधि तय की है।
तीसरा- सरकार ने पहले ही तय कर दिया था कि इस मानसून सत्र में 31 बिल आने वाली है। इस पर चर्चा करने के बाद इसे पास कराया जाना था। इन 31 बिलों पर चर्चा करने में भी इस सत्र का अच्छा खासा समय निकल जाता। ऐसे में अगर इन बिलों को पास न करा कर मणिपुर वाले मुद्दे पर दीर्घकालिक चर्चा होती तो ये बिल पास नहीं हो पाते। और इस वजह से सरकार को फिर अगले सत्र का इन्तजार करना पड़ता।
Published on:
21 Jul 2023 02:25 pm
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