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Success Story: खुद की आंखों में नहीं है रोशनी पर सैकड़ों दृष्टिहीन लोगों की जिंदगी में भरा उ​जाला

Meet Bhavesh Bhatia founder of Sunrise Candels: बहुत सारे लोग करना तो बहुत कुछ चाहते हैं पर विजन के अभाव में वह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाते हैं। लेकिन भावेश समाज के लिए एक मिसाल की तरह हैं जिन्होंने दृष्टिहीन होने के बावजूद अपने 'विजन' के दम पर लक्ष्य हासिल करने में कामयाबी पायी। आज उनकी कंपनी का नेटवर्थ 350 करोड़ रुपए से ज्यादा का हो चुका है।

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सूरज ढलने के साथ ही लोगों को रोशनी की दरकार होती है और ऐसे में बिजली ना हो तो घर में सभी मोमबत्ती ढूंढने में लग जाते हैं। इस बात की कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति जो बचपन से ही दृष्टिहीन हैं, उन्होंने रोशनी से जुड़ा कारोबार करने के बारे में ना सिर्फ सोचा बल्कि उसको अर्श पर पहुंचाया। भावेश भाटिया नाम के शख्स ने ना सिर्फ कारोबार करने की सोची बल्कि अपने जैसे 2,250 से ज्यादा दृष्टिहीनों को रोजगार देकर उनके जीवन में उजाला भर दिया। भावेश ने वर्ष 1994 में सनराइज कैंडल नाम की मोमबत्ती बनाने की कंपनी की शुरूआत की और तीन दशक से कम समय में अब यह कंपनी 10 हजार से ज्यादा डिजाइन की मोमबत्तियां बना रहा है। भावेश ने सिर्फ 5 किलोग्राम वैक्स के साथ मोमबत्ती बनाने और उसे घूम-घूमकर बेचने का काम शुरू किया था। आज उनकी कंपनी सनराइज कैंडल के करीब 60 देशों के 1,000 मल्टीनेशनल कंपनियां नियमित ग्राहक हैं।

IMAGE CREDIT: Bhavesh Facebook

बचपन से क्राफ्ट में माहिर थे भावेश

भावेश चंदूभाई भाटिया गुजरात के कच्छ में पैदा हुए लेकिन रोजी-रोटी के लिए उनका परिवार महाराष्ट्र के गोंदिया में आकर बस गया। वह बताते हैं कि उन्हें बचपन में भी बहुत कम दिखता था। बड़ी चीजें भी धुंधली दिखती थीं। वह मां को धन्यवाद देते हुए कहते हैं कि मेरी मां ने मेरा दाखिला सामान्य स्कूल में कराया ताकि मेरे मन में यह भाव ना आए कि मैं दूसरे बच्चों से कुछ अलग या कमतर हूं। मेरी मां मेरी पढ़ाई के लिए बहुत जतन करती थीं। लेकिन भावेश सही मायनों में दूसरों बच्चों से अलग थे। कुछ विशेष थे। उनका मन स्कूली दिनों से क्राफ्ट में लगने लगा था। उनके बनाए प्रोजक्ट्स स्कूल के शिक्षकों को पसंद आते और वे उनकी खूब खुले दिल से तारीफें किया करते थे। किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने में कई बातों, कई लोगों का योगदान होता है। भावेश के व्यक्तित्व में उनकी मां, परिवार और शिक्षकों का बहुत योगदान है। मां ने एक बार भावेश से कहा- तुम दुनिया को नहीं देख सकते हो तो क्या हुआ, तुम कुछ ऐसा करो कि तुम्हें दुनिया देखे। भावेश ने मां के कहे इस वाक्य को मन में बसा लिया और जिंदगी में कुछ कर गुजरने की ठान ली।

भावेश पैरालिंपिक में जीत चुके हैं कई पदक

भावेश अपने बचपन के दिनों को लेकर भावुक होते हैं और मां से जुड़ा एक वाकया सुनाते हैं। वह बताते हैं कि मेरी मां ने मुझे एक कहानी सुनाई थी। उस कहानी में कुछ पारसी लोग थे जिन्होंने साइकिल पर दुनिया की सैर की थी। जाहिर सी बात है कि मैं भी कहानी सुनने के साथ-साथ कल्पना के आकाश में उड़ान भरने लगा और इस जुगत में लग गया कि किसी तरह से साइकिल से ऐसी लंबी यात्रा पर कहीं निकल लूं। दसवीं की परीक्षा के बाद उन्होंने दोस्त के साथ गोंदिया से नेपाल तक की यात्रा की। उन्होंने बताया- 'पूरे स्कूल में हम दोनों ही दिव्यांग थे इसलिए हमारे बीच अच्छी बनती थी। हमने डबल पैडल वाली साइकिल उठाई और नेपाल की यात्रा पर निकल पड़े। मेरा दोस्त का एक पैर गड़बड़ था। इस टूर से लौटने साथ ही हम अपने शहर और आसपास के इलाके में मशहूर हो गए।' आपको बता दूं कि भावेश एक पैरा ओलंपियार्ड भी हैं। उन्होंने देश के लिए जैवलिन थ्रो में कई अवॉर्ड जीते। उन्हें राज्य और केंद्र सरकार की ओर से भी ढेरों अवॉर्ड्स मिल चुके हैं।

कैंसर के चलते मां की हो गई मौत

भावेश ने अर्थशास्त्र विषय में एम. ए. तक की पढ़ाई की। रोजीरोटी के सिलसिले में वह महाबलेश्वर चले गए और वहीं बस गए। पिता एक गुजराती ट्रस्ट की धर्मशाला में केयरटेकर थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद परिवार चलाने की जिम्मेदारी इनके कंधों पर आ गई। इस बीच उनकी मां को कैंसर हो गया। उनके इलाज में सारी जमा पूंजी चली गई लेकिन मां को अंतिम यात्रा पर जाने से रोका नहीं जा सका। मां के इलाज के दौरान ही उन्हें नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड द्वारा क्रिएटिव ट्रेनिंग कोर्स करवाने की बात पता चली। भावेश ने यहां दाखिला लिया और एक साल तक मोमबत्ती बनाने सहित कई और तरह के कोर्स किए।

IMAGE CREDIT: Bhavesh Facebook

अलग-अलग शहरों में लगाने लगे मोमबत्तियों की प्रदर्शनी

रोजगार मांगने के दौरान नौकरी नहीं मिलने से हताश होने की जगह उन्होंने नया कुछ करने की ठानी। नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड से ट्रेनिंग लेने के बाद वर्ष 1994 में 50 रुपये में एक सैकंड हैंड कार भाड़े पर ली और 5,000 रुपये इधर-उधर से इकट्ठा करके सनराइज कैंडल की नींव रखी। महाबलेश्वर में पर्यटकों का आना जाना बहुत रहता है इसलिए उन्हें ग्राहक आसानी से मिलने लगे। वह दूसरे शहरों में भी मोमबत्ती की अलग-अलग डिज़ाइन बनाकर शहर-दर-शहर प्रदर्शनी लगाने लगे। महाबलेश्वर घूमने आई टूरिस्ट नीता भी इनसे जुड़ गईं और कुछ हफ्तों तक मोमबत्ती बनाने के काम में उनकी सहायता की। काम के सिलसिले में दोनों के बीच प्रेम का पौधा पनपा और बाद में दोनों ने शादी कर ली।

IMAGE CREDIT: Bhavesh Facebook

नीता के जीवन में आने से बदली जिंदगी

नीता एक समृद्ध परिवार से नाता रखती हैं और दृष्टि होते हुए भी उन्होंने भावेश की इंसानियत और काम के प्रति उनकी लगन देखकर शादी की। शादी के बाद भावेश और नीता ने महाबलेश्वर से छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिंदोड़ा गांव में 8 कमरे किराए पर लिए और 5 दृष्टिहीन लोगों के साथ मिलकर मोमबत्ती बनाने की एक छोटी सी फैक्ट्री डाल दी। काम इतना था नहीं इसलिए कमरे का किराया देना, कच्चा माल और लोगों को पगार देना और परिवार चलाने का खर्च उठाना मुश्किल से हो पाता था। कई बार कारोबार बंद करने तक की नौबत आई। लेकिन ऐसी विकट परिस्थितियों में वह मां की सुनाई सफल इंसानों और महापुरुषों की प्रेरक कहानियों से प्रेरणा पाते और समय की विपरीत धारा में तैरकर आगे बढ़ते चले जाते।

वर्ष 2007 में इनके जीवन में एक नया मोड़ आया। पुणे में एक दोस्त की मदद से तिलक स्मारक हॉल में इनके 12 हजार डिजाइन की मोमबत्तियों की तीन दिन तक प्रदर्शनी लगाई गई। यहां हजारों की संख्या में लोग पहुंचे और इनके काम को खूब सराहा। इसके बाद भावेश को कई बड़ी कंपनियों से ऑर्डर मिले। इसके बाद से भावेश ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा और हर रोज सफलता की नई इबारत लिखते चले ही जा रहे हैं। भावेश की कहानी लिखते हुए हिंदी के कवि और गीतकार गोपालदास नीरज की एक कविता याद आ गई जो उनपर बहुत हदतक सटीक बैठती है...

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

बहुत बार आई-गई यह दिवाली
मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

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