
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत (फोटो- एएनआई)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि भारत की राष्ट्रीयता किसी राजनीतिक संरचना की उपज नहीं, बल्कि एक शाश्वत सभ्यतागत भावना है जो धर्म और संस्कृति पर आधारित है। उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रत्व 1947 में शुरू नहीं हुआ, यह सनातन है और सीमाओं से परे अस्तित्व में है।
यहां आरएसएस के शताब्दी वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में संघ की 100 वर्ष की यात्रा : नए क्षितिज विषय पर व्याख्यान देते हुए भागवत ने कहा, हमारा राष्ट्र 1947 में अस्तित्व में नहीं आया। यह धर्म पर आधारित है, राजनीतिक सत्ता या भूभाग पर नहीं।
उन्होंने कहा कि भारत में कोई अहिंदू नहीं है क्योंकि सभी एक ही पूर्वजों के वंशज हैं और इस देश की मूल संस्कृति हिंदू है।
ऐसा नहीं है कि अंग्रेजों ने हमें राष्ट्रीयता दी। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं। दुनिया के हर देश की अपनी मूल संस्कृति होती है। भारत की संस्कृति क्या है? जो भी वर्णन करें, वह हमें हिंदू शब्द की ओर ले जाता है। सनातन धर्म इस सभ्यता की नैतिक व्यवस्था है और हिंदुत्व उसकी जीवंत आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है।
उन्होंने कहा कि हम किसी सरकार या दानदाता पर निर्भर नहीं हैं। स्वयंसेवकों की वर्ष में एक बार दी जाने वाली गुरु दक्षिणा से ही संघ चलता है। यही हमें स्वतंत्र और निडर रखता है। भागवत ने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों ने हमेशा कठिन परिस्थितियों का सामना किया है। हमारे कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, आलोचना हुई, प्रतिबंध लगे, हमें बदनाम किया गया, लेकिन संघ बढ़ता रहा क्योंकि हम केवल खुद पर निर्भर हैं।
संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि भारत का हिंदू राष्ट्र होना किसी बात के विरोध में नहीं है। यह हमारे संविधान के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके अनुरूप है। संघ का लक्ष्य समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। संघ का लक्ष्य अब हर गांव, हर जाति और हर वर्ग तक पहुंचना है। दुनिया हमें विविधता में देखती है, लेकिन हमारे लिए यह विविधता एकता की सजावट है।
Updated on:
09 Nov 2025 08:03 am
Published on:
09 Nov 2025 08:02 am
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