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One Nation, One Election: भाजपा सांसद पीपी चौधरी को बड़ी जिम्मेदारी, संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष नियुक्त

सांसद पीपी चौधरी को 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' विधेयक की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

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लोकसभा सचिवालय ने गुरुवार को घोषणा की कि भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) के वरिष्ठ नेता और सांसद पीपी चौधरी को 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' विधेयक की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह समिति लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने से संबंधित विधायी उपायों की जांच करेगी। इसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना और बार-बार होने वाले चुनावों से जुड़ी आवर्ती व्यय को कम करना है। मौजूदा जेपीसी में लोकसभा से 27 और राज्यसभा से 12 सदस्य होंगे। समिति को संसद के अगले सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन लोकसभा को अपनी रिपोर्ट सौंपने का कार्य सौंपा जाएगा।

शुक्रवार को राज्यसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने से ठीक पहले, सदन ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर दो विधेयकों के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाने के संबंध में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। मेघवाल ने संविधान में संशोधन के लिए संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पेश किया था, जिसे 'एक राष्ट्र, एक चुनाव विधेयक' भी कहा जाता है।

जेपीसी की सदस्य है प्रियंका गांधी

इससे पहले, लोकसभा ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' विधेयक को जेपीसी को भेजने का संकल्प भी पारित किया था। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा और मनीष तिवारी, एनसीपी की सुप्रिया सुले, टीएमसी के कल्याण बनर्जी और भाजपा के पीपी चौधरी, बांसुरी स्वराज और अनुराग सिंह ठाकुर जेपीसी में सदस्य हैं। जेपीसी का हिस्सा बनने वाले अन्य लोकसभा सांसदों में सीएम रमेश, पुरुषोत्तमभाई रूपाला, विष्णु दयाल राम, भर्तृहरि महताब, संबित पात्रा, अनिल बलूनी, विष्णु दत्त शर्मा, मनीष तिवारी, सुखदेव भगत, धर्मेंद्र यादव आदि शामिल हैं।

क्या भारत में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की अवधारणा नई है?

यहां यह ध्यान देना जरूरी है कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' भारत में कोई नई अवधारणा नहीं है। 1950 में संविधान को अपनाने के बाद, 1951 से 1967 के बीच हर पांच साल में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव एक साथ हुए थे। 1952, 1957, 1962 और 1967 में केंद्र और राज्यों के लिए चुनाव एक साथ हुए। नए राज्यों के गठन और कुछ पुराने राज्यों के पुनर्गठन के कारण यह प्रक्रिया समाप्त हो गई। 1968-1969 में विभिन्न विधानसभाओं के विघटन के बाद, इस प्रथा को पूरी तरह से छोड़ दिया गया था।