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ऑपरेशन सिंदूर: फाइलों में सिमटे सुरक्षित बंकर, मौत के साये में जीने को मजबूर सरहद के सजग प्रहरी

Border Bunker Crisis Jammu: ऑपरेशन सिंदूर के बीच जम्मू के सीमावर्ती गांवों में सुरक्षित बंकरों की हकीकत सामने आई है। 15 मरले जमीन की शर्त, बदहाल बंकर और सुरक्षा इंतजामों की कमी के बीच ग्रामीण आज भी मौत के साये में जीवन जीने को मजबूर हैं।

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भारत

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Rahul Yadav

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विकास सिंह

May 13, 2026

Jammu Border Bunker Ground Report

Jammu Border Bunker Ground Report (Image: Patrika.com)

Jammu Border Bunker Ground Report: जम्मू के सीमावर्ती गांवों में इस समय सिर्फ सीमा पार से आने वाले मोर्टार, ड्रोन और मिसाइलों का खतरा ही नहीं है, बल्कि सरकारी वादों और सुस्त व्यवस्था से भी लोग जूझ रहे हैं। एक तरफ गांवों के लोग हर वक्त जान जोखिम में डालकर खेतों में काम कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनकी सुरक्षा के लिए बनाए जाने वाले बंकर आज भी फाइलों में अटके पड़े हैं। सरकार ने वर्षों पहले सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षित बंकर बनाने का वादा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई गांवों में आज भी पर्याप्त बंकर नहीं हैं। जहां कुछ बंकर बने भी हैं, वहां उनकी हालत बदहाल है। ग्रामीणों का कहना है कि गोलाबारी के समय सबसे ज्यादा डर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को रहता है, लेकिन सुरक्षा के इंतजाम बेहद कमजोर हैं।

15 मरले जमीन की शर्त बनी सबसे बड़ी बाधा

ग्रामीणों के मुताबिक बंकर निर्माण में सबसे बड़ी अड़चन प्रशासन की जमीन संबंधी शर्त है। पूर्व सरपंच सवर्ण लाल बताते हैं कि प्रशासन एक सामुदायिक बंकर के लिए करीब 15 मरले जमीन मांग रहा है। इसके लिए हर घर से डेढ़ से दो मरले जमीन देने को कहा जा रहा है। सीमांत किसानों का कहना है कि उनके लिए इतनी जमीन देना संभव नहीं है। ग्रामीण चाहते हैं कि उन्हें अपनी जमीन पर छोटे अंडरग्राउंड या डबल स्टोरी बंकर बनाने की अनुमति दी जाए, लेकिन प्रशासन इस मांग पर सहमत नहीं हो रहा। इसी कारण पिछले एक साल से कई गांवों में बंकर निर्माण का काम अटका हुआ है।

बदल गई जंग, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था पुरानी

65 वर्षीय लालचंद ने 1965, 1971 और कारगिल युद्ध देखा है। उनका कहना है कि पहले सीमा पर आमने-सामने गोलीबारी होती थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। लालचंद कहते हैं, “अब ड्रोन और मिसाइलों का दौर है। खतरा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।”

प्रशासन की चेतावनी के बाद कई गांव खाली हो जाते हैं, लेकिन कुछ गांवों के लोग अपनी जमीन और पशुओं को छोड़कर जाने को तैयार नहीं होते। वे आज भी सीमा के पास खेतों में काम करते हैं, जहां दूसरी ओर पाकिस्तानी किसान दिखाई देते हैं।

बंकर कम, बदहाली ज्यादा

ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि जो कम्युनिटी बंकर बने भी हैं, उनमें से कई अब कबाड़खाने में बदल चुके हैं। कहीं कट्टों का ढेर लगा है तो कहीं टूटे बाथरूम पड़े हैं। कई बंकरों के बाहर कूड़े का अंबार है और लोहे के दरवाजे जंग खाकर टूट रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने बंकर बनवाने के बाद उनकी देखरेख की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया।

100 घरों पर सिर्फ 13 बंकर

एक गांव में 100 से ज्यादा परिवार रहते हैं, लेकिन वहां सिर्फ 13 सामुदायिक बंकर हैं। यानी एक बंकर पर सात से आठ परिवार निर्भर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गोलाबारी के दौरान इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एक ही बंकर में रहना बेहद मुश्किल हो जाता है। कुछ संपन्न परिवारों ने अपने खर्च पर निजी बंकर बनवा लिए हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अब भी सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं।

महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल

गांव की चंचला देवी बताती हैं कि गोलाबारी के समय महिलाओं की परेशानी सबसे ज्यादा बढ़ जाती है। उनके मुताबिक, “जब 30-30 परिवार एक साथ बंकर में रहते हैं तो महिलाओं की प्राइवेसी खत्म हो जाती है। टॉयलेट इस्तेमाल करना तक मुश्किल हो जाता है। कई बार हमें दूसरे गांवों में जाना पड़ता है।” महिलाओं का कहना है कि बंकरों में सैनिटेशन और जरूरी सुविधाओं का भी गंभीर अभाव है।

ग्रामीणों ने उठाई ‘इजराइली मॉडल’ की मांग

सीमावर्ती गांवों के लोग अब इजराइल की तरह सुरक्षा मॉडल लागू करने की मांग कर रहे हैं। ग्रामीण सुभाष चंद्र का कहना है कि हर घर के नीचे छोटा बंकर होना चाहिए और गांव में हर 200 मीटर पर बड़ा सामुदायिक बंकर बनाया जाना चाहिए। इजराइल में 1992 के बाद बने हर घर में ‘ममद’ नाम का सुरक्षित कमरा बनाना अनिवार्य है। यह कमरा मिसाइल और बम हमलों से बचाने के लिए खास तरीके से बनाया जाता है। वहां सायरन बजते ही लोग अपने घर के भीतर बने सुरक्षित कमरे में चले जाते हैं।

कागजों में बड़ी योजना, जमीन पर अधूरी तैयारी

साल 2017 में जम्मू संभाग के पांच सीमावर्ती जिलों जम्मू, कठुआ, सांबा, राजौरी और पुंछ में 14,460 निजी और सामुदायिक बंकरों को मंजूरी दी गई थी। इन इलाकों में एक लाख से ज्यादा लोग गोलाबारी के खतरे में रहते हैं। लेकिन जमीनी स्थिति यह है कि आज भी कई गांवों में जरूरत के मुकाबले बहुत कम बंकर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 100 से 150 घरों वाले एक गांव में कम से कम तीन से छह बड़े सामुदायिक बंकर और छोटे निजी शेल्टर जरूरी हैं।