
सुप्रीम कोर्ट (ANI)
Supreme Court : सरकारी कर्मचारियों के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत मिलने वाले फायदों को सरकार मनमानी शर्तें लगाकर नहीं रोक सकती है। अगर किसी कर्मचारी ने अपने पद पर रहते हुए तय समय सीमा पूरी कर ली है, तो उसे अपग्रेडेशन का पूरा हक मिलेगा। न्यायालय ने साफ कहा कि वेतन आयोग के मूल नियमों में अपनी तरफ से कोई नई शर्त जोड़कर कर्मचारियों को परेशान करना गलत है। इस फैसले से उन लाखों कर्मचारियों के वित्तीय लाभ का रास्ता साफ हो गया है, जिन्हें विभागीय अड़ंगों के कारण उनका हक नहीं मिल पा रहा था।
यह पूरा विवाद बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) के कर्मचारियों से जुड़ा हुआ है। कुछ कर्मचारी शुरुआत में सबऑर्डिनेट इंजीनियरिंग कैडर में भर्ती हुए थे। बाद में जब कैडर का विलय हुआ, तो उन्हें जूनियर इंजीनियर का पदनाम दे दिया गया। नियमों के मुताबिक, लेवल 8 (ग्रेड पे 4,800 रुपये) पर चार साल की लगातार सेवा पूरी करने के बाद ये कर्मचारी सातवें वेतन आयोग के तहत लेवल 9 (ग्रेड पे 5,400 रुपये) में अपग्रेडेशन के हकदार हो गए थे। लेकिन, सरकार ने यह कहते हुए उन्हें लाभ देने से मना कर दिया कि यह फायदा सिर्फ उन लोगों को मिलेगा जिनकी 'सीधी भर्ती' (डायरेक्ट रिक्रूटमेंट) हुई है।
कर्मचारियों ने अपने हक के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने कर्मचारियों की दलील को सही माना और सरकार को लेवल 9 का लाभ देने का निर्देश दिया। इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने सरकार की इस अपील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि सरकार ने कर्मचारियों का हक गलत तरीके से रोका है।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी द्वारा लिखे गए फैसले में साफ कहा गया है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों में 'सीधी भर्ती' जैसी कोई भी अतिरिक्त शर्त नहीं लिखी गई है। इसलिए सरकार अपग्रेडेशन देने से इनकार करने के लिए अपनी मर्जी से ऐसी शर्त नहीं थोप सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लेवल 8 में चार साल की सेवा पूरी करने और वरिष्ठता व योग्यता के आधार पर एक जूनियर इंजीनियर इस लाभ का पूरा हकदार है। सरकार द्वारा सही कारण बताए बिना लाभ से इनकार करना गलत है, इसलिए अपील खारिज की जाती है।
इस फैसले के बाद कर्मचारी संगठनों में खुशी की लहर है। कर्मचारी यूनियनों का कहना है कि यह फैसला उन सभी विभागों के लिए एक नज़ीर बनेगा, जहां अधिकारी वेतन आयोग के नियमों की गलत व्याख्या करके कर्मचारियों को उनके जायज प्रमोशन और वित्तीय लाभ से वंचित कर देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब अन्य केंद्रीय विभागों में भी हलचल तेज हो गई है। ऐसे कई अन्य मामले ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट में लंबित हैं, जहां नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन (NFU) को मनमाने नियमों के तहत रोका गया है। अब उन मामलों में भी इसी फैसले का हवाला देकर कर्मचारियों को जल्द राहत मिलने की उम्मीद है।
यह मामला सरकारी सिस्टम में मौजूद उस लालफीताशाही को भी उजागर करता है, जहां ब्यूरोक्रेसी किसी न किसी तकनीकी खामी या शब्दों के हेरफेर का बहाना बना कर कर्मचारियों को लाभ देने में देरी करती है। वेतन आयोग ने जो सिफारिशें बिना शर्त लागू की थीं, उनमें 'एंट्री-लेवल' या 'डायरेक्ट रिक्रूटमेंट' जैसे शब्द डालकर लाभ रोकने की कोशिश की गई ।
Published on:
03 Apr 2026 09:11 pm
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