
Gulab Kothari Editor-in-Chief of Patrika Group
Reaction On Gulab Kothari Article : स्वयं का कल्याण करने में असमर्थता को पराधीनता करार देते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला 'शरीर ही ब्रह्मांड' के आलेख 'तंत्र ही परतंत्र करता है' को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है। उन्होंने कहा है कि आलेख कर्म की प्रधानता का विस्तार है और बताता है कि काम ही सब कारणों का कारण है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से...
आलेख में कर्म की प्रधानता का सर्वविधि विस्तार हुआ है। वास्तव में सभी निहित कार्यो में कर्म की ही प्रधानता है। आगम आदि शास्त्रों में भी कर्म की बात कही है। मूल प्रकृति स्वरूपा देवी की आराधना में भी कर्म की श्रेष्ठता कही गई है। पुरुष और प्रकृति से ही संसार की रचना हुई है। सारी मनुष्य जाति के साथ समस्त चराचर जीव भी उन पर प्रकृति के अधीन हैं। तंत्र आवश्यक कार्यो का सम्पादन करता है । एक गति प्रदान करता है। एक क्रिया मात्र से वह संचरित होता है तथा परतंत्रता की ओर उन्मुख होता है। तंत्र के मूल में भी कर्म ही है। अतः कर्म सभी कारणों का कारण एवम जीवन तथा जगत का मूल है।
डॉ शोभना तिवारी, निदेशक, डॉ शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति शोध संस्थान, रतलाम
भारतीय संस्कृति की बात हो या विभिन्न मतों व पंथों की, सबमें एक बात सामान्य है कि उनमें धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप और जन्म-पुनर्जन्म की बात बताई जाती है। हमारे जैसे कर्म होंगे, वैसा हमें फल मिलेगा। मृत्यु पश्चात दूसरा जन्म उसी के आधार पर निर्धारित होगा। यह सनातन संस्कृति की एक श्रेष्ठ व्यवस्था कही जा सकती है जो मानव को मानवीयता, प्रकृति व जीवों से संवाद स्थापित कर समृद्ध व निरोगी जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है। इसमें शामिल पूजन पाठ व आराध्यों के माध्यम से भी यहीं संदेश प्रसारित किया जाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति को बाहर से आने वाली असनातनीय शक्तियों ने मिटाने या उसे दूषित करने का निरंतर प्रयास किया है, जो अब भी जारी है। हमें अपनी जड़ों से फिर जुडकऱ जल, पृथ्वी, आकाश और ग्रह-नक्षत्रों के करीब जाना होगा, तभी विश्व शांति की बात पूर्ण होगी।
पं. सौरभ दुबे, एस्ट्रोलॉजर, जबलपुर
भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा वर्ण व्यवस्था पर आधारित रही है। वर्ण आत्मा का स्वरूप है और मन प्राण और वाक को आत्मा कहा जाता है। कर्म के आधार पर जातियां बनाई गई हैं। जातियां हजारों हो सकती हैं, लेकिन परमात्मा की सृष्टि में सभी समान हैं। मानव जिस प्रकार का कर्म करता है उसे उसका फल अवश्य मिलता है। मनुष्य देह कर्म करने के लिए स्वतंत्र है परंतु फल के भोग के लिए पराधीन है, परन्तु आत्मा ईश्वर प्राप्ति के लिए सर्वदा स्वतंत्र है ।
जयंती सिंह लोधी, सागर
मानव समाज में जातियां कर्म के आधार पर निर्धारित की जाती हैं। जो जैसा कर्म करता है, उसके आधार पर उसे उस जाति का मान लिया जाता है। देश में माता-पिता के आधार पर उसकी सन्तान की जाति मानी जाती है। देश में कर्म, कर्मफल और पुनर्जन्म का सिद्धांत लागू है। इसके आधार पर ही मानव को फल मिलता है। हालांकि, पाश्चात्य संस्कृति में न तो इसे माना जाता है और न ही इसे प्राथमिकता दी जाती है। गुलाब कोठारी ने लेख के माध्यम से मानव के कर्म, कर्मफल, जाति, प्राकृतिक गुण सहित अन्य चीजों को आध्यत्मिक रूप से समझाया है।
अजय सिंह ठाकुर, बालाघाट
हमारी संस्कृति हमेशा से ही कर्म प्रधान रही है। मानव जाति के कर्म प्रधान कार्यों की बदौलत ही उनका हर जन्म तय होता है। संसार रूपी इस जीवन में उसे कर्म के साथ भोग और रोग सभी कुछ देखना होता है। कोठारी का लेख कर्मफल की पूर्णरूपेण व्याख्या करता है।
गौरव उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर
पाश्चात्य शिक्षा में शरीर को ही सब कुछ माना गया है जबकि हमारी प्रकृति पुुनर्जन्म की प्रधानता लिए हुए है। कोठारी का आलेख कई गूढ़ रहस्यों को उजागर करने वाला है। हम प्रकृति को चुनौती देते हैं, लेकिन सच यही है हम प्रकृति से जुड़े हैं। मां - बाप ही हमें आकृति देते हैं। अन्न से भी हमारा मन और प्रकृति बदलती है। अन्न हमारे मन में सात्विक भाव लाता है। मन में सात्विक भाव आने पर ही हम प्रकृति से जुड़े रह सकते हैं। अन्न और प्रकृति के विपरीत जाकर हम भोग की संस्कृति में पड़ गए हैं जबकि हमारी संस्कृति भोग की नहीं बल्कि आत्मा से परमात्मा को जोड़ने की है
राजेश मोर, प्रदेश संगठन मंत्री वैश्य महासम्मेलन, दतिया
वास्तव में हमारे प्राचीन ग्रंथो में जिस वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है वह कर्म प्रधान थी, किंतु पाश्चात्य विघटनकारी ताकतो द्वारा शिक्षा के नाम पर झूठ का जो माया जाल फैलाया गया उसने वर्ण व्यवस्था को जन्म से जोड़कर समाज में दमन और शोषण के कुचक्र द्वारा वैमनस्य बढ़ाने का ही कार्य किया है। निश्चय ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस तरह के यथार्थपरक आलेखों की नितांत आवश्यकता है ताकि समाज सही दिशा में अग्रसर हो सके। राजस्थान पत्रिका व कोठारी जी को साधुवाद जिन्होंने एक बार पुनः समाज का सजग प्रहरी होने की अपनी भूमिका का भली भांति निर्वहन किया।
डॉ विभा तिवारी सह आचार्य (अंग्रेजी विभाग), श्रीगंगानगर
जिस तरह से बीज का स्वभाव ही फल का रूप लेता है। उसी व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, उसकी जाति भी वही होती है। तंत्र ही परतंत्र लेख में जन्म व जाति के माध्यम से जीवन में जाति व वर्ण के भेद को सहजता पूर्वक बताया गया है। यह बिल्कुल सत्य है कि संतान की जाति माता-पिता के समान ही होती है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को पहचान उसके कर्मों से मिलती है। अच्छा करेंगे तो हमें अच्छा मिलेगा। कुल मिलाकर व्यक्ति के कर्म ही विशेष हैं। इसलिए अच्छे कर्म करते रहने चाहिए।
संतोष शर्मा, किशोरपुरा, कोटा
एक ईश्वर ही सार्वभौमिक सत्य है। सृष्टि में कोई छोटा बड़ा नहीं है। शरीर रूपी चोला बदल जाता है। आत्मा रूपी तत्व प्रमुख है। इसकी ऊर्जा शरीर को चेतना देती है। मन भ्रम जाल में फंसाता है। इससे वशीभूत होकर व्यक्ति अपने आप को सर्वेसर्वा मान लेता है। देव व राक्षस दोनों हमारे मन की उपज है। अच्छे कर्म देवतुल्य व बुरे कर्म असुर का रूप होते हैं। जीवन-मरण से मुक्ति के लिए मन को ईश्वर में केन्दि्रत करते हुए जीवन जीने मेें ही जीवन की सार्थकता है।
बृजेश कांत पंचोली, महावीर नगर तृतीय, कोटा
भारतीय संस्कृति में जातियां नहीं थी। जो व्यक्ति जैसा कर्म करता था, वहीं जाति होती थी। कालान्तर में भेद आया और जन्म के अनुसार जाति मान ली गई। जो आज तक माना जा रहा है। हर व्यक्ति में प्रभु का वास माना गया है। सभी के हृदय में ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र प्रतिष्ठित है। जब सभी में ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र है तो कोई छोटी या बड़ी जाति का कैसे हो सकता है।
विजय कुमार शर्मा, पाली
संसार में हर किसी की उत्पत्ति प्रकृति से हुई है। वह चाहे पशु-पक्षी, मानव या अन्य कोई हो। आत्मा के बिना शरीर निर्जीव है। आत्मा के निकलते ही वह शव में बदल जाता है। आत्मा के तीन रूप मन, प्राण, वाक् है। इस कारण शरीर का मोह नहीं होना चाहिए। मोह आत्मा के प्रति होना चाहिए। जो प्रभु का अंश है। हर व्यक्ति की जाति केवल एक है मानव। शुद्ध या स्वर्ण तो बाद में मानव ने बनाए है।
नारायणलाल त्रिवेदी, पाली
जैसा अन्न खाएंगे वैसी ही प्रकृति बदल जाती है। मनुष्य का वर्ण नहीं बदलता।आज के लेख में प्रकृति और वर्ण की व्याख्या करते हुए मनुष्य की मनोदशा को अपने शब्दों में बताया है। इस वर्ण व्यवस्था में भी वर्णसंकरता की नई फसल उगने लगी है। मानव प्रकृति के प्रतिकूल कार्य कर रहा है।
डॉ देवेश शर्मा, चिकित्सक, भिण्ड
Published on:
04 Nov 2023 12:49 am
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