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कैप्टन विक्रम बत्रा की वीरगाथा: या तो मैं तिरंगे को लहराकर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर, कहा वाे कर दिखाया

या तो मैं तिरंगे को लहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर, लेकिन मुझे यकीन हैं, मैं आऊंगा जरूर। ये अंतिम शब्द थे कैप्टन विक्रम बत्रा के। उन्हाेंने जाे कहा था वाे कर दिखाया था। जानिए कैप्टन विक्रम बत्रा की वीरगाथा।

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Santosh Trivedi

Jul 20, 2017

करगिल युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटा दी थी। मगर इस युद्ध में भारत की जीत का सबसे बड़ा फैक्टर था प्वाइंट 5140। कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना दुश्मन के नाक के नीचे से 5140 प्वाइंट पर कब्जा करने में सफल हुई थी। मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजे गए कैप्टन विक्रम बत्रा 7 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे।

मैं आऊंगा जरूर...

या तो मैं तिरंगे को लहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर, लेकिन मुझे यकीन हैं, मैं आऊंगा जरूर। ये अंतिम शब्द थे कैप्टन विक्रम बत्रा के। कैप्‍टन बत्रा ने कारगिल की प्‍वाइंट 5140 से दुश्‍मनों को खदेडऩे के लिए अपने साथियों के साथ अभियान छेड़ा और कई घंटों की गोलीबारी के बाद आखिरकार मिशन कामयाब हुआ। इस जीत के बाद जब उनकी प्रतिक्रिया ली गई तो उन्‍होंने जवाब दिया, ये दिल मांगे मोर... बस यहीं से इन लाइनों को पहचान मिल गई।

'जय माता दी' कहते हुए वीरगति को प्राप्त हुए

5140 प्वाइंट पर कब्जा करने के बाद कैप्टन बत्रा ने स्वेच्छा से अगले मिशन के रूप में 4875 प्वाइंट पर भी कब्जा करने निर्णय लिया। मिशन लगभग पूरा हो चुका था। लड़ाई के दौरान एक विस्फोट में लेफ्टीनेंट नवीन के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे। जब कैप्टन विक्रम बत्रा लेफ्टीनेंट को बचाने के लिए पीछे घसीट रहे थे तभी दुश्मन की गाेली उनकी की छाती में गोली लगी और वे 'जय माता दी' कहते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

मोटी तनख्वाह की नौकरी छोड़कर सेना को चुना

करगिल युद्ध में विक्रम बत्रा के कभी न भूलने वाले योगदान के लिए उन्‍हें उन्‍हें 15 अगस्त 1999 काे सर्वोच्च सम्‍मान परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया। यह पदक उनके पिता जीएल बत्रा ने प्राप्त किया। जब ये शहीद हुए उस समय उनकी उम्र केवल 25 साल थी। विक्रम बत्रा विदेश में मोटी तनख्वाह की नौकरी छोड़कर सेना में भर्ती हुए थे। विज्ञान में स्नातक करने के बाद विक्रम बत्रा का चयन मर्चेंट नेवी के लिए हो गया था। इसके लिए उन्‍हें हांगकांग जाना था, लेकिन इसको ज्‍वाइन करने से महज तीन दिन पहले ही इसमें जाने से मना कर दिया। उनका कहना था कि वह इसमें नहीं बल्कि सेना में जाकर देश की सेवा करेंगे। इसके बाद सीडीएस के जरिए सेना में उनका चयन हुआ।

इस तरह जगी सेना में जाने की ललक

पालमपुर में 9 सितंबर 1974 को जीएल बत्रा के यहां 2 बच्‍चों का जन्म हुआ। इनमें से एक थे विक्रम बत्रा और दूसरे थे विशाल बत्रा। दोनों के जन्‍म में महज 15 मिनट का ही अंतर था। दोनों भाइयों का चेहरा काफी कुछ मिलता था। यही वजह थी कि कई बार लोग कंफ्यूज भी हो जाया करते थे। उनकी शुरुआती पढ़ाई पालमपुर के ही सेंट्रल स्‍कूल में हुई थी, जबकि बाद की पढ़ाई उन्‍होंने सेना की छावनी में स्थित स्‍कूल से पूरी की। छावनी में आते-जाते जवानों और सैन्‍य अधिकारियों को देखकर ही उनके मन में एक फौजी बनने की ललक जगी थी। पढ़ाई के अलावा वह खेल में भी अव्‍वल थे।

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